Rampur’s Habshi Halwa: नवाब हामिद अली खां अफ्रीका से लाए थे कारीगर, हकीम जी की तीसरी पीढ़ी संभाल रही विरासत; सीएम योगी की योजना से खाड़ी देशों से लेकर दुनिया भर में महका स्वाद
ओडीओसी: कभी नवाबों के खास दस्तरखान की शान रहा रामपुर का 'हब्शी हलवा' बना ब्रांड, यूपीआईटीएस में सुहेल ने रोजाना कमाए 60 हजार रुपये
– पहले स्टॉल के लिए खर्च करने पड़ते थे लाखों, अब सरकार दे रही मुफ्त मंच; शुद्ध देसी घी व जड़ी-बूटियों से तैयार हलवे को जीआई टैग और आधुनिक पैकेजिंग से विदेशों में पहुंचाने की तैयारी
Rampur‘s Habshi Halwa: योगी सरकार की महत्वाकांक्षी ‘एक जिला, एक व्यंजन’ (ओडीओसी) योजना सदियों पुराने पारंपरिक व्यंजनों और स्थानीय कारीगरों को वैश्विक मंच दिलाने का सबसे सशक्त माध्यम बनकर उभरी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की इस पहल के चलते कभी सीमित दायरे में सिमटा रामपुर का ऐतिहासिक ‘हब्शी हलवा सोहन’ आज देश-विदेश के सैलानियों और खरीदारों की जुबान पर चढ़ चुका है। योजना के लाभार्थी और इस नवाबी विरासत को आगे बढ़ा रहे रामपुर के कारोबारी सुहेल खां बताते हैं कि पहले अंतरराष्ट्रीय ट्रेड फेयर में स्टॉल लगाने के लिए दो से तीन लाख रुपये की मोटी पूंजी जुटाना छोटे हलवाइयों के बूते से बाहर था। आज सरकार के सहयोग से उन्हें बड़े मंचों पर पूरी तरह मुफ्त स्टॉल मिल रहे हैं। इसी का नतीजा रहा कि ग्रेटर नोएडा में आयोजित 5 दिवसीय ‘यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो’ (यूपीआईटीएस) में उनके स्टॉल पर रोजाना 40 से 50 किलो हलवे की खपत के साथ प्रतिदिन लगभग 60 हजार रुपये की बिक्री दर्ज हुई, जबकि रामपुर के हुनर हाट में भी 10 दिनों में 90 हजार रुपये का कारोबार हुआ था।

नवाब हामिद अली खां अफ्रीका से लाए थे कारीगर
हब्शी हलवा सोहन के ऐतिहासिक सफर की परतें खोलते हुए सुहेल खां बताते हैं कि यह स्वाद किसी आम रसोई की पैदाइश नहीं, बल्कि नवाबी दौर की नायाब सौगात है। तत्कालीन नवाब हामिद अली खां जब अफ्रीका के दौरे पर गए थे, तो उन्हें वहां का यह हलवा बेहद पसंद आया। नवाब साहब उस अफ्रीकी कारीगर को अपने साथ रामपुर ले आए। उस कारीगर ने नवाब के हुक्म पर तमाम दुर्लभ जड़ी-बूटियों, मेवे, केसर और शुद्ध देसी घी के मेल से एक लाजवाब हलवा तैयार किया, जिसे ‘हब्शी हलवा’ नाम दिया गया। वतन लौटने से पहले उस उस्ताद कारीगर ने यह गुप्त नुस्खा रामपुर निवासी अब्दुल हकीम खान (हकीम जी) को सिखा दिया। सुहेल के अनुसार, उनके दादा हकीम जी ने वर्ष 1930 में इसे आम अवाम के लिए बनाना शुरू किया था, तब हलवा और देसी घी दोनों 4 रुपये प्रति किलो बिका करते थे। आज हकीम जी की तीसरी पीढ़ी इस पारंपरिक मिठास को उसी शुद्धता के साथ आगे बढ़ा रही है।
ओडीओसी का संबल: सऊदी के शेखों से लेकर सात समंदर पार तक बढ़ी दीवानगी
कारोबारी सुहेल का कहना है कि रामपुर आने वाला हर मुसाफिर यहां का हब्शी हलवा सोहन खरीदे बिना नहीं लौटता। इसकी ताकत और बेजोड़ स्वाद की शोहरत अब केवल उत्तर प्रदेश या देश के महानगरों तक सीमित नहीं है, बल्कि सात समंदर पार खाड़ी देशों तक इसकी भारी मांग है। 1990 के दशक में जब रामपुर से लोग खाड़ी देशों में काम के सिलसिले में जाने लगे, तो यह हलवा सऊदी अरब और दुबई तक पहुंचा, जहां आज वहां के शेख भी इसके मुरीद हो चुके हैं। ओडीओसी योजना ने इस दीवानगी को एक संगठित बाजार दिया है। पहले जो लोग इसके नाम से भी वाकिफ नहीं थे, वे आज सरकारी प्रदर्शनियों के माध्यम से सीधे जुड़कर व्यक्तिगत और थोक (बल्क) ऑर्डर दे रहे हैं।
अंकुरित गेहूं, 4 किलो देसी घी और धीमी आंच पर 3 घंटे की तपस्या
हब्शी हलवे की बेजोड़ गुणवत्ता का राज समझाते हुए सुहेल बताते हैं कि 15 किलो हलवा तैयार करने में करीब 4 किलो शुद्ध देसी घी का इस्तेमाल होता है। इसमें दूध, मेवे, केसर, हेज़लनट के साथ महज 1 से 2 प्रतिशत अंकुरित गेहूं (समनक) मिलाया जाता है। समनक की खूबी यह है कि यह देसी घी को अपने भीतर बांधकर रखता है और हलवे को सूखने या घी छोड़ने नहीं देता। करीब 3 घंटे तक धीमी आंच पर लगातार पकने वाला यह हलवा शुद्ध देसी घी और जड़ी-बूटियों के प्राकृतिक असर से सामान्य तौर पर भी दो महीने तक खराब नहीं होता।
जीआई टैग, जापानी पैकेजिंग और अंतरराष्ट्रीय आउटलेट का खाका
सिंगापुर की 15 सदस्यीय मीडिया टीम द्वारा हब्शी हलवे पर वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) बनाए जाने के बाद इसकी शोहरत को नए पंख लगे हैं। सुहेल के मुताबिक, अब ओडीओसी के मार्गदर्शन में नई दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पैकेजिंग और जापानी पैकेजिंग तकनीक की मदद लिए जाने पर विचार किया जा रहा है, जिससे इस हलवे की शेल्फ लाइफ एक साल तक सुरक्षित की जा सके। चाकू बाजार की पुश्तैनी दुकान और ईदगाह के सामने बड़े आउटलेट के बाद, अब उनकी कार्ययोजना उत्पाद को विशिष्ट भौगोलिक पहचान (GI टैग) दिलाने, दिल्ली-मुंबई के बड़े मॉल्स व सुपर स्टॉकिस्ट नेटवर्क से जोड़ने, ‘ब्लिंकइट’ पर ऑनलाइन उतारने और दुबई के ग्लोबल विलेज फेयर में स्थायी आउटलेट खोलने की है, ताकि रामपुर का यह ऐतिहासिक नवाबी स्वाद पूरी दुनिया में अपनी धाक जमा सके।
“यह योजना हम जैसे पारंपरिक हलवाइयों और छोटे कारीगरों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। पहले जहां अंतरराष्ट्रीय मेलों में स्टॉल के लिए 2-3 लाख रुपये जुटाना हमारे बूते से बाहर था, वहीं सरकार ने हमें मुफ्त मंच देकर सीधे वैश्विक खरीदारों से जोड़ दिया। इसी का नतीजा है कि आज हमारे नवाबी हलवे को देश-विदेश में पहचान और थोक ऑर्डर मिल रहे हैं। यह योजना छोटे हुनरमंदों की रीढ़ है, इसे किसी भी कीमत पर बंद नहीं होना चाहिए, यह चलती रहनी चाहिए।”
