अन्याय, पाप, शोषण और लूट की नगरी गुरुग्राम में रहता हूं- पलायन को दिल चाहता है लेकिन संत कबीर वाणी “करण गे सो भरण गे तू क्यों भया उदास “ रोकती हैं!

गुस्ताख़ी माफ़, हरियाणा: — पवन कुमार बंसल

मैं इन दिनों गुरुग्राम में रह रहा हूँ—एक ऐसा शहर, जो आजकल अन्याय, शोषण और अनियमितताओं की कहानियों से भरा हुआ प्रतीत होता है। कई बार यहाँ से पलायन करने का मन होता है, पर तभी संत कबीर की वाणी याद आती है—
“कर्म करेंगे, फल भी मिलेगा, फिर क्यों हों उदास?”
यहीं मेरा आधार और वोटर कार्ड बना है, इसलिए इस शहर से एक रिश्ता भी जुड़ गया है। लेकिन नेताओं, बिल्डरों और अधिकारियों की मिलीभगत के किस्से सुनकर मन व्यथित हो उठता है। कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो कदम-कदम पर भ्रष्टाचार का सामना होता है।
मीडिया भी कई बार पेड न्यूज़ और विज्ञापनों के जाल में उलझा दिखाई देता है।

सामाजिक कार्यकर्ता आवाज़ उठाते हैं, परंतु सत्ता के गलियारों में अक्सर वह अनसुनी रह जाती है। यह भी कहा जाता है कि बड़े उद्योगपतियों से लेकर अंतरराष्ट्रीय हस्तियों तक के हित यहाँ जुड़े हैं। हरियाणा को सबसे अधिक राजस्व देने वाला यह शहर, विडंबना यह है कि लूट और अव्यवस्था की कहानियों से भी जुड़ा हुआ है।

इतिहास की ओर देखें तो अन्याय और शोषण की जड़ें हमें उस प्रसंग में भी दिखाई देती हैं, जब गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा माँगा था। शायद इसी परंपरा के प्रतीक के रूप में गुड़गाँव का नाम बदलकर गुरुग्राम रखा गया। सरकार कोई भी रही हो, यहाँ आम आदमी, मजदूर और गरीब वर्ग अक्सर शोषण का शिकार होता है, जबकि भ्रष्ट तंत्र फलता-फूलता रहता है।

गीता का उपदेश मुझे यहाँ से पलायन करने से रोकता है—अपने कर्म करते रहने की प्रेरणा देता है। भले ही परिणाम सामने आएँ या नहीं, यह कलम अपना कार्य करती रहेगी। रोहतक मेडिकल कॉलेज के सेवानिवृत्त सर्जन डॉ. रणबीर दहिया ने कहा था—“यह तो भैंस के आगे बीन बजाने जैसा है।”
पर मेरा मानना है—बीन बजाना भी ज़रूरी है, क्योंकि शायद कभी कोई सुनने वाला भी मिल जाए।

दुमछला

गुरुग्राम जैसे शहर—गुरुग्राम—वास्तव में विरोधाभासों से भरे हुए हैं। एक तरफ़ तेज़ विकास, कॉरपोरेट दुनिया, ग्लास की इमारतें; दूसरी तरफ़ वही पुरानी समस्याएँ—अनियमितता, शोषण, और व्यवस्था की खामियाँ। यह सिर्फ़ एक शहर की कहानी नहीं, बल्कि भारत के तेज़ी से शहरीकरण की भी कहानी है, जहाँ विकास की रफ्तार अक्सर संस्थागत ईमानदारी से आगे निकल जाती है।

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