यह एक रोचक और विचारणीय स्थिति है कि देश की संसद की कैंटीन में सांसदों और मंत्रियों के लिए भोजन की व्यवस्था विशेष रियायती दरों पर उपलब्ध कराई जाती है। वहीं सांसदों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए संसद की कैंटीन में कई प्रकार के शीतल पेयों जैसे – पेप्सी, कोकाकोला, थम्सअप, लिम्का आदि सॉफ्ट ड्रिंक्स उपयोग पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। यह निर्णय निश्चित रूप से स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और संतुलित जीवनशैली को बढ़ावा देने का संदेश देता है।
लेकिन इसी के साथ एक बड़ा प्रश्न भी खड़ा होता है। यदि कोल्ड ड्रिंक्स और अत्यधिक मीठे पेय स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं, तो क्या उनकी हानिकारकता केवल संसद भवन की चारदीवारी तक सीमित है? देश का आम नागरिक, युवा, किसान, मजदूर, विद्यार्थी और कर्मचारी भी तो उसी समाज का हिस्सा हैं, जिनका स्वास्थ्य राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी है।
जब नीति-निर्माताओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए विशेष कदम उठाए जाते हैं, तब आम जनता स्वाभाविक रूप से अपेक्षा करती है कि उसके स्वास्थ्य की रक्षा के लिए भी उतनी ही गंभीरता दिखाई जाए। स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता, पोषण संबंधी शिक्षा और जनहित में प्रभावी नीतियां केवल विशेष वर्ग तक सीमित न रहकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचनी चाहिए।
एक स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है जब स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं केवल सत्ता के गलियारों तक सीमित न रहें, बल्कि हर नागरिक के जीवन का हिस्सा बनें। आखिर लोकतंत्र की असली ताकत संसद में बैठने वाले कुछ सौ लोगों से नहीं, बल्कि देश के करोड़ों नागरिकों से बनती है। इसलिए जनता का सवाल भी जायज है—यदि यह व्यवस्था स्वास्थ्य के हित में है, तो इसका लाभ और संदेश पूरे देश के लिए समान रूप से क्यों न हो?
