संविधान हत्या दिवस पर बोले केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल-आपातकाल के थे तीन दलाल इंदिरा, संजय और बंसीलाल

 

  • रिपोर्ट- विनोद मित्तल

फरीदाबाद के सेक्टर 12 स्थित सेंट्रल पार्क में कांग्रेस द्वारा वर्ष 1975 में लोकतंत्र एवं संविधान की हत्या कर लगाए गए आपातकाल की 51वीं वर्षगांठ के अवसर पर “संविधान हत्या दिवस” मनाया गया वही इस अवसर पर इस विषय पर संगोष्ठी का आयोजन भी किया गया जिसमें हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय ऊर्जा तथा शहरी विकास मंत्री आदरणीय श्री मनोहर लाल और केंद्रीय राज्यमंत्री कृष्णपाल गुर्जर ने मुख्य वक्ता के रूप में शिरकत की और आपातकाल के दौरान किए गए जुल्मों सितम पर प्रकाश डाला। वही इस अवसर पर उनके साथ मंत्रीगण, विधायकगण, भाजपा जिला अध्यक्ष, भाजपा पदाधिकारी, आपातकाल सेनानी एवं उनके परिजन तथा बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता उपस्थित रहें l इस अवसर पर ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल ने आपातकाल के दौरान जेल में रहे बुजुर्गों को शाल ओढ़ाकर उनका सम्मान किया l

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मनोहर लाल ने कहा कि कार्यक्रम में ऐसे अनेक लोग उपस्थित हैं जिन्होंने आपातकाल की यातनाएं स्वयं झेली हैं तथा जेल गए थे। उन्होंने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि जिन लोगों ने आपातकाल का दौर नहीं देखा, उनके लिए उस कालखंड को समझना और उससे सीख लेना अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि आपातकाल का एक ऐसा पहलू भी है जिसने देश की जनता को लोकतंत्र की वास्तविक ताकत का अनुभव कराया। उस समय आम लोगों के मन में यह धारणा बन गई थी कि देश में केवल कांग्रेस ही शासन कर सकती है। लेकिन आपातकाल के विरोध में जनता का आक्रोश इतना बढ़ा कि 1977 के आम चुनाव में पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। इससे देशवासियों को यह विश्वास मिला कि लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास होती है और वह किसी भी सरकार को बदल सकती है।

मनोहर लाल ने कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले और उसके बाद उत्पन्न राजनीतिक परिस्थितियों के बीच तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने आपातकाल लागू किया। इंदिरा गांधी ने सत्ता बचाने के लिए संविधान में संशोधन किए तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का प्रयास हुआ। उन्होंने कहा कि उस समय सत्ता का अहंकार इतना बढ़ गया था कि इंदिरा इज़ इंडिया जैसे नारे दिए जाने लगे थे। मनोहर लाल ने कहा कि आपातकाल के दौरान लोगों की जबरन उठाकर नसबंदी की गई, वह लोकतंत्र के इतिहास का एक काला अध्याय है। उस समय बड़े पैमाने पर भय और दमन का माहौल था। यह एक ऐसा समय था जब प्रशासनिक शक्ति का दुरुपयोग अपने चरम पर था। मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन हुआ। अनेक लोगों को जेल में डाल दिया और यातनाएं दी। उन्होंने कहा कि ऐसे अनुभव सुनकर आज भी मन विचलित हो जाता है कि अपने ही स्वतंत्र देश में ऐसा समय भी आया था। इसीलिए आज इन घटनाओं को याद करना आवश्यक है। लोकतंत्र की रक्षा के प्रति हम सजग रहें और भविष्य में ऐसी परिस्थितियाँ दोबारा न उत्पन्न हों। यह केवल इतिहास नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक चेतावनी भी है।

केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल ने कहा कि आपातकाल का फायदा भी हुआ कि लोगों ने सरकार पलट दी इससे पहले कांग्रेस के अलावा लोग अन्य दलों को नहीं जानते थे उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि उन सब में वनस्पति घी को डेल्टा के नाम से खरीदा जाता था और लोग समझते थे की वनस्पति घी डालडा है ऐसे ही कोलगेट को टूथपेस्ट और टूथपेस्ट को कोलगेट के नाम से ही जानते थे और लोगों को अनुमान ही नहीं था कि कांग्रेस के इलावा किसी अन्य पार्टी की सरकार आ सकती है ल

वहीं उन्होंने आपातकाल के दौरान दी गई यात्राओं का जिक्र करते हुए कहा कि जेल में बंद लोगों के हाथ बांधकर उनके पजामा में चूहे छोड़ दिए जाते थे और आज हम आपातकाल की बात या चर्चा क्यों कर रहे हैं क्योंकि हमें लोकतंत्र को बचाना है उन्होंने कहा कि 1996 के बाद कांग्रेस में वंशवाद खत्म हुआ और नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने और फिर अटल बिहारी वाजपेई को सत्ता में आने का अवसर मिला l उन्होंने कहा कि आज देश में लगभग सभी राज्यों में बीजेपी की सत्ता है जिसका श्रेय मोदी जी को जाता है वही मजाक की बात यह है कि दूसरा श्रेय राहुल गांधी को जाता है l

केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर

वही इस अवसर पर केंद्रीय राज्य मंत्री कृष्णपाल गुर्जर ने कहां की25 जून भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की कोई सामान्य तिथि नहीं है। यह वह दिन है जब सत्ता के अहंकार ने संविधान की आत्मा को चुनौती दी और देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचलने का प्रयास किया गया। 25 जून 1975 की रात केवल आपातकाल की घोषणा नहीं थी, बल्कि नागरिक स्वतंत्रताओं, अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतांत्रिक अधिकारों पर लगाया गया एक कठोर प्रतिबंध था।उन्होंने कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र पर लगा ऐसा काला अध्याय है जिसे इतिहास कभी भुला नहीं सकता। विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और हजारों नागरिकों को केवल इसलिए जेलों में डाल दिया गया क्योंकि उन्होंने सत्ता के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस किया था।

 

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