नेताओं को गद्दी की आशा, और जनता की आशा निराशा

  • रिपोर्ट- मनोज कुमार यादव

एटा :- नेताओं की राजनीति अब जनता की सेवा नहीं, बल्कि गद्दी पर कब्ज़ा जमाने का खेल बन चुकी है। चुनाव आते ही भाषणों में जुमले गूंजते हैं – गरीबी हटाने की कसमें, विकास के वादे, रोज़गार की झूठी तस्वीरें। मगर हक़ीक़त यह है कि जनता हर बार ठगी जाती है। नेता चुनाव जीतते ही गद्दी और सत्ता की मलाई में डूब जाते हैं, और जनता रोज़मर्रा की समस्याओं – महंगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और अव्यवस्था – से जूझती रहती है।

आज हाल यह है कि जनता की उम्मीदें अब टूटने लगी हैं। जहां नेता के लिए कुर्सी “सेवा का साधन” नहीं बल्कि “स्वार्थ की सीढ़ी” बन चुकी है, वहीं जनता की ज़िंदगी बदहाली के अंधेरों में डूबी हुई है। गली-गली गड्ढे हैं, सरकारी दफ्तरों में रिश्वत है, अस्पतालों में इलाज की जगह दलाली है और शिक्षा राजनीति का अखाड़ा बन चुकी है।

नेताओं की गद्दी की आशा और जनता की निराशा का यह अंतराल अब खतरनाक मोड़ पर पहुँच चुका है। जनता की आहें और नेताओं के वाह-वाह वाले नारे साथ-साथ नहीं चल सकते। वक्त आ गया है कि जनता सवाल पूछे, हिसाब मांगे और उस सत्ता के ढोंग को बेनकाब करे जो सिर्फ़ वोट के समय जनता को याद करती है और बाद में उसी जनता को भुला देती है।

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