श्री भरत मुनि जी महाराज ने श्री कृष्ण की दिव्य रास पंचाध्यायी का अत्यंत भावपुर्ण एवं रस पूर्ण वर्णन किया

ऐलनाबाद, 08 मई (एम पी भार्गव) खंड के नजदीकी ग्राम उम्मेदपुरा में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के दौरान आज कथा व्यास परम पूज्य महंत श्री भरतमुनि जी महाराज ने श्रीकृष्ण की दिव्य रास पंचाध्यायी का अत्यंत भावपूर्ण एवं रसपूर्ण वर्णन किया। महाराज श्री ने कहा कि यह साधारण मिलन नहीं बल्कि जीव और परमात्मा का दिव्य संगम है। भगवान श्रीकृष्ण प्रत्येक जीवात्मा के हृदय में विराजमान हैं तथा जो भक्त अपने हृदय को प्रेम और भक्ति से पवित्र करता है, वही भगवान के दिव्य रस का अनुभव कर पाता है।
महाराज श्री ने गोपी भाव का वर्णन करते हुए कहा कि गोपी कोई साधारण स्त्री जाति नहीं, बल्कि वह शुद्ध हृदय की अवस्था है। “गो” अर्थात इन्द्रियां और “पी” अर्थात पान करना, यानी जो अपनी समस्त इन्द्रियों से भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम रस का पान करे वही सच्ची गोपी कहलाती है। उन्होंने बताया कि गोपियां चलते, फिरते, उठते-बैठते हर परिस्थिति में केवल श्रीकृष्ण का ही स्मरण करती थीं।
कथा के दौरान महाराज श्री ने बताया कि जिस व्यक्ति की मृत्यु निकट होती है, उसके संकेत देवता पहले ही देने लगते हैं। उन्होंने दिव्य लोकों तथा कर्म के प्रभाव का भी सुंदर वर्णन किया। महाराज श्री ने कहा कि जो व्यक्ति भगवान की कथा, भजन और सत्संग से जुड़ता है, उसके हृदय के विकार धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं और जीवन में शांति एवं आनंद का संचार होता है।
ग्राम उम्मेदपुरा में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के दौरान आज कथा व्यास परम पूज्य महंत श्री भरतमुनि जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की अनेक अद्भुत एवं लोककल्याणकारी लीलाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। कथा सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और पूरा पंडाल भक्तिमय वातावरण से गुंजायमान हो उठा।
महाराज श्री ने कथा में बताया कि जब मथुरा में अत्याचारी कंस का आतंक बढ़ गया तब भगवान श्रीकृष्ण को वृंदावन से मथुरा लाने के लिए अक्रूर जी को भेजा गया। अक्रूर जी जब गोकुल पहुंचे तो श्रीकृष्ण और बलराम के दर्शन कर भावविभोर हो उठे। उन्होंने भगवान की स्तुति करते हुए उन्हें मथुरा चलने का निवेदन किया। श्रीकृष्ण के मथुरा प्रस्थान के समय समस्त ब्रजवासी और गोपियां विरह में व्याकुल हो उठीं।
महाराज श्री ने आगे बताया कि मथुरा पहुंचकर भगवान श्रीकृष्ण ने सबसे पहले कुवलयापीड़ हाथी का संहार किया और फिर रंगभूमि में चाणूर तथा मुष्टिक जैसे बलशाली पहलवानों का वध किया। अंत में भगवान ने अत्याचारी कंस को उसके सिंहासन से नीचे गिराकर उसका वध कर दिया और मथुरा को भयमुक्त किया। इस प्रसंग पर श्रद्धालुओं ने “जय श्रीकृष्ण” के जयकारों से वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
कथा में कल्यावन वध का भी सुंदर वर्णन किया गया। महाराज श्री ने बताया कि कल्यावन अत्यंत शक्तिशाली और अहंकारी राजा था। भगवान श्रीकृष्ण उसे युद्ध करते हुए एक गुफा तक ले गए, जहां राजा मुचकुंद तपस्या में लीन थे। कल्यावन ने उन्हें श्रीकृष्ण समझकर पैर से स्पर्श किया, जिससे मुचकुंद की दृष्टि पड़ते ही वह भस्म हो गया। महाराज श्री ने कहा कि अहंकार का अंत निश्चित है और भगवान सदैव अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।
इसके पश्चात वृषभासुर वध की कथा सुनाते हुए महाराज श्री ने बताया कि दैत्य वृषभासुर ने बैल का रूप धारण कर ब्रज में उत्पात मचाया, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने उसका अंत कर धर्म की रक्षा की। उन्होंने कहा कि जब-जब अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान किसी न किसी रूप में अवतरित होकर भक्तों की रक्षा करते हैं।
कथा में संदीपनी ऋषि प्रसंग का भी मार्मिक वर्णन हुआ। महाराज श्री ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने गुरु संदीपनी ऋषि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण की। गुरुदक्षिणा में जब गुरु माता ने अपने मृत पुत्र को वापस लाने की इच्छा व्यक्त की, तब भगवान श्रीकृष्ण यमलोक से गुरु पुत्र को जीवित वापस लेकर आए। इस प्रसंग के माध्यम से महाराज श्री ने गुरु भक्ति और सेवा के महत्व को समझाया।
महाराज श्री ने जरासंध के आक्रमण का वर्णन करते हुए बताया कि कंस वध के बाद क्रोधित जरासंध ने अनेक बार मथुरा पर आक्रमण किया, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बुद्धि और पराक्रम से हर बार धर्म की रक्षा की। उन्होंने कहा कि भगवान केवल बल से ही नहीं बल्कि नीति और धैर्य से भी अधर्म का नाश करते हैं इसके बाद कथा पंडाल में रुक्मिणी विवाह उत्सव धूमधाम से मनाया गया। श्रद्धालुओं ने फूलों की वर्षा की, भजन-कीर्तन हुए तथा भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। महाराज श्री के शिष्य रामनिवास रसिया के कृष्ण रूक्मणी के विवाह के सुंदर भजनों पर श्रद्धालु विवाह उत्सव में झूम उठे।इसके बाद कथा पंडाल में रुक्मिणी विवाह उत्सव धूमधाम से मनाया गया। श्रद्धालुओं ने फूलों की वर्षा की, भजन-कीर्तन हुए तथा भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। महिलाओं ने मंगलगीत गाए और श्रद्धालु विवाह उत्सव में झूम उठे।

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