CM Yogi in Gorakhpur: विदेशी आक्रांताओं ने भारत का वैभव ही नहीं, ज्ञान परंपरा को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश की- योगी आदित्यनाथ
CM Yogi in Gorakhpur: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने भारतीय ज्ञान परंपरा को संरक्षित करने, उसके प्रमाणों को सामने लाने और आधुनिक तकनीक के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाने पर जोर दिया है। गोरखपुर स्थित श्री गोरखनाथ मंदिर में आयोजित सप्त दिवसीय पुण्यतिथि समारोह के व्याख्यान-सत्र में मुख्यमंत्री ने भारतीय ज्ञान परंपरा के ऐतिहासिक विकास, प्राचीन शिक्षण केंद्रों और पांडुलिपियों के संरक्षण से जुड़े विषयों पर अपने विचार रखे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि उनके अनुसार भारत पर हुए विदेशी आक्रमणों का उद्देश्य केवल देश के भौतिक वैभव को नुकसान पहुंचाना नहीं था, बल्कि ज्ञान और सांस्कृतिक परंपराओं को भी कमजोर करना था। उन्होंने मंदिरों पर हुए हमलों को इसी व्यापक संदर्भ में रखने की बात कही। ब्रिटिश काल को लेकर उन्होंने कहा कि उस दौर में तरीका अलग था और भारतीयों में अपनी भाषा, चिकित्सा पद्धति, परंपराओं और मूल्यों को लेकर भ्रम पैदा किया गया।
यह कार्यक्रम युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 57वीं और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की 12वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित किया गया। समारोह के तहत ‘भारतीय ज्ञान परंपरा का वर्तमान परिप्रेक्ष्य’ विषय पर व्याख्यान-सत्र हुआ। गोरखनाथ मंदिर परिसर के महंत दिग्विजयनाथ स्मृति भवन सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में संतों, शिक्षाविदों और विभिन्न संस्थानों से जुड़े लोगों ने हिस्सा लिया।
विदेशी आक्रमण और ज्ञान परंपरा को लेकर क्या बोले योगी?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा लंबे समय से उसकी सभ्यता का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। उन्होंने रामायण काल के दंडकारण्य का उदाहरण देते हुए ऋषियों के आश्रमों पर हमलों का उल्लेख किया। इसके बाद उन्होंने विदेशी आक्रमणों और मंदिरों पर हमलों का संदर्भ देते हुए कहा कि उनके अनुसार इनका असर केवल संपत्ति और स्थापत्य तक सीमित नहीं था, बल्कि ज्ञान और सांस्कृतिक परंपराओं को भी प्रभावित करने का प्रयास हुआ।
उन्होंने सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण का उल्लेख करते हुए इसे सनातन परंपरा पर प्रहार के संदर्भ में प्रस्तुत किया। हालांकि ऐसे ऐतिहासिक प्रसंगों की व्याख्या इतिहासकारों के बीच अलग-अलग संदर्भों में की जाती रही है, इसलिए मुख्यमंत्री का यह विश्लेषण उनके संबोधन के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
ब्रिटिश काल में तरीका बदलने का दावा
मुख्यमंत्री ने ब्रिटिश शासन के दौर का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय भारत की परंपराओं को कमजोर करने का तरीका अलग था। उनके मुताबिक भारतीयों को अपनी भाषा, चिकित्सा पद्धतियों और ज्ञान परंपरा को लेकर भ्रमित किया गया।
योगी आदित्यनाथ ने कहा कि संस्कृत की जगह अंग्रेजी और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की जगह आधुनिक चिकित्सा को अधिक महत्व मिलने से भारतीय समाज धीरे-धीरे अपनी परंपराओं और जड़ों से दूर होता गया।
उन्होंने इस संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा को फिर से समझने और उसके प्रमाणों को व्यवस्थित तरीके से सामने लाने की आवश्यकता बताई। उनके मुताबिक किसी भी परंपरा या ऐतिहासिक दावे को केवल भावनात्मक आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाण के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
तक्षशिला और नालंदा का किया उल्लेख
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की पहचान उसकी ज्ञान परंपरा के कारण रही है। उन्होंने तक्षशिला और नालंदा जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत में सदियों पहले उच्च शिक्षा और ज्ञान-विमर्श की परंपरा मौजूद थी।
उन्होंने काशी, उज्जैन और कांची जैसे केंद्रों का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार भारत में ज्ञान का दायरा केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि भाषा, व्याकरण, अर्थशास्त्र, विज्ञान, खगोल, आयुर्वेद, ज्योतिष, शिल्प और तकनीक जैसे अनेक क्षेत्रों तक फैला हुआ था।
मुख्यमंत्री ने कुंभ की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि इसे केवल धार्मिक स्नान तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक-त्र्यंबकेश्वर जैसे स्थानों पर संतों और विद्वानों के बीच विचार-विमर्श की परंपरा भी रही है।
एक लाख से ज्यादा पांडुलिपियों के संरक्षण की बात
योगी आदित्यनाथ ने भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण में पांडुलिपियों की भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने बताया कि संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, काशी में एक लाख से अधिक प्राचीन पांडुलिपियां एकत्रित की गई हैं और उनके संरक्षण तथा डिजिटाइजेशन का काम किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री के मुताबिक केवल विश्वविद्यालयों में ही नहीं, बल्कि परिवारों, विद्वानों के निजी संग्रह, प्राचीन मठों और मंदिरों में भी महत्वपूर्ण ज्ञान सामग्री मौजूद हो सकती है। उन्होंने अयोध्या, प्रयागराज, मथुरा-वृंदावन और लखनऊ सहित विभिन्न स्थानों पर मिली पांडुलिपियों, ताम्रपत्रों और शिलालेखों का भी उल्लेख किया।
उनका कहना था कि इस तरह की सामग्री को संरक्षित करके आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना जरूरी है। आधुनिक तकनीक के माध्यम से पुराने दस्तावेजों को डिजिटल रूप में सुरक्षित करने से शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए इन तक पहुंच आसान हो सकती है।
‘सत्य को प्रमाण के साथ रखना होगा’
मुख्यमंत्री ने भारतीय ज्ञान परंपरा को लेकर एक महत्वपूर्ण बात यह कही कि किसी भी दावे को प्रमाण के साथ प्रस्तुत करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जब भारतीय इतिहास और ज्ञान परंपरा के बारे में बात होगी तो अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आएंगी।
उनके अनुसार एक पक्ष सत्य को प्रमाणित करने का होगा, दूसरा पक्ष उसे असत्य बताने की कोशिश कर सकता है और तीसरा पक्ष दुष्प्रचार के जरिए लोगों के मन में संशय पैदा कर सकता है। ऐसे में तकनीक और प्रमाण दोनों की मदद से सही जानकारी सामने रखने की जरूरत होगी।
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को वर्तमान समय के अनुरूप विकसित करने और आधुनिक माध्यमों से लोगों तक पहुंचाने का आह्वान किया।
पाणिनि, पतंजलि और चाणक्य की विरासत का उल्लेख
मुख्यमंत्री ने नई पीढ़ी को भारतीय विद्वानों और आचार्यों की विरासत से परिचित कराने की जरूरत बताई। उन्होंने पाणिनि, पतंजलि, आयुर्वेद के आचार्यों और चाणक्य के अर्थशास्त्र का उल्लेख किया।
योगी आदित्यनाथ ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में भाषा और व्याकरण से लेकर चिकित्सा, अर्थशास्त्र, विज्ञान और तकनीक तक विभिन्न क्षेत्रों में योगदान की परंपरा रही है। उन्होंने नैमिषारण्य का उल्लेख करते हुए कहा कि करीब तीन हजार वर्ष पहले वहां 88 हजार ऋषियों के एकत्र होने की परंपरा का वर्णन मिलता है, जहां श्रवण परंपरा से प्राप्त ज्ञान को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया से जोड़ा जाता है।
योग को केवल आसन तक सीमित न रखने की बात
कार्यक्रम में जगद्गुरु विश्वेश प्रपन्नाचार्य ने योग की व्यापक परंपरा पर चर्चा की। उन्होंने यम, नियम, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, आसन, ध्यान और समाधि जैसे योग के विभिन्न अंगों का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि योग को केवल शारीरिक आसनों तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। भारतीय परंपरा में योग को जीवन-पद्धति और साधना के व्यापक संदर्भ में समझा जाता रहा है।
भारत की योग परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है। इस विषय को लेकर मुख्यमंत्री ने भी भारतीय परंपराओं को आधुनिक समय में वैश्विक स्तर तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
संस्कारयुक्त शिक्षा पर भी चर्चा
जगद्गुरु स्वामी श्रीधराचार्य ने शिक्षा और संस्कार के संबंध पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि केवल जानकारी हासिल करना ही शिक्षा का उद्देश्य नहीं होना चाहिए, बल्कि शिक्षा व्यक्ति के चरित्र और सामाजिक जिम्मेदारी को भी मजबूत करे।
उनके अनुसार भारतीयता से जुड़ी शिक्षा लोककल्याण की भावना को बढ़ावा दे सकती है। उन्होंने ज्ञान को आत्मबोध और आध्यात्मिक विकास से जोड़कर देखने की बात कही।
‘जड़ों से कटकर विकास संभव नहीं’
कार्यक्रम में उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने कहा कि विकसित भारत की अवधारणा में भारतीय ज्ञान परंपरा के कई सूत्र मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि अपनी जड़ों और मूल से पूरी तरह कटकर विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।
आईआईटी बीएचयू के प्रो. वी. रामनाथन ने भी भारतीय सभ्यता में ज्ञान को दिए गए महत्व का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को अपनी विरासत की जानकारी आधुनिक माध्यमों से दी जानी चाहिए। उनके अनुसार अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत से दूरी समाज में अलगाव की भावना को बढ़ा सकती है।
सप्त दिवसीय समारोह में संतों और शिक्षाविदों की मौजूदगी
गोरखनाथ मंदिर में आयोजित इस समारोह की शुरुआत संतों द्वारा ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। कार्यक्रम में जगद्गुरु संतोषाचार्य सतुआ बाबा, महंत नारायण गिरि, महंत राजू दास, महंत शेरनाथ, स्वामी नरसिंह दास और महंत राम बालक दास समेत कई संत मौजूद रहे।
इसके अलावा महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद से जुड़े संस्थानों के प्रधानाचार्य, शिक्षक, अभिभावक और छात्र-छात्राएं भी कार्यक्रम में शामिल हुए। गोरखनाथ मंदिर में महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि के अवसर पर सात दिवसीय श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया जा रहा है।
आधुनिक तकनीक से ज्ञान परंपरा को जोड़ने पर जोर
मुख्यमंत्री के संबोधन का एक प्रमुख विषय भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक तकनीक का मेल रहा। उन्होंने कहा कि पुरानी पांडुलिपियों, शिलालेखों, ताम्रपत्रों और अन्य ज्ञान-सामग्री को संरक्षित करने के साथ उन्हें डिजिटल माध्यमों पर उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
इससे शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और नई पीढ़ी को प्राचीन ज्ञान सामग्री तक पहुंच बनाने में मदद मिल सकती है। साथ ही, ऐतिहासिक दावों और परंपराओं को प्रमाणों के साथ प्रस्तुत करने की प्रक्रिया को भी मजबूती मिल सकती है।
कुल मिलाकर गोरखपुर में आयोजित इस व्याख्यान-सत्र में भारतीय ज्ञान परंपरा, उसके संरक्षण और आधुनिक समय में उसकी प्रासंगिकता पर चर्चा हुई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में इतिहास और परंपरा से जुड़े अपने विचार रखते हुए प्रमाण आधारित प्रस्तुति और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिया। कार्यक्रम में शामिल वक्ताओं ने भी शिक्षा, योग, संस्कार और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ने की आवश्यकता पर अपने विचार रखे।
