सफलता की कहानी: मुख्यमंत्री ग्रामोद्योग योजना से बदली शाहबाद के अनुज की किस्मत

1.40 लाख के ऋण से शुरू किया मधुमक्खी पालन, 8 लोगों को दे रहे रोजगार

-10वीं पास अनुज अब कमा रहे 80 हजार की शुद्ध आय

-अक्टूबर से फरवरी के सीजन में प्रति बॉक्स 8-10 किलो शहद उत्पादन

रामपुर, प्रदेश सरकार की ‘मुख्यमंत्री ग्रामोद्योग रोजगार योजना‘ ग्रामीण अंचल के युवाओं के जीवन में समृद्धि और आत्मनिर्भरता का नया सवेरा ला रही है। जिले की शाहाबाद तहसील अंतर्गत आनवरिया गांव निवासी 32 वर्षीय हाईस्कूल पास अनुज सिंह ने इस योजना के माध्यम से अपनी किस्मत की नई इबारत लिखी है। पूर्व में पारंपरिक खेती-बाड़ी से सालाना महज 60,000 रुपये तक की सीमित उपज हासिल करने वाले अनुज ने 1.40 लाख रुपये का सरकारी ऋण लेकर मधुमक्खी पालन का व्यवसाय शुरू किया।

आज वे 65 बॉक्स के माध्यम से न केवल सालाना 70 से 80 हज़ार रुपये की शुद्ध बचत अर्जित कर रहे हैं, बल्कि गांव व आसपास के 7 से 8 युवाओं को 6,000 से 10,000 रुपये प्रतिमाह के वेतन पर प्रत्यक्ष रोजगार भी दे रहे हैं। उनकी इस उपलब्धि से प्रेरित होकर क्षेत्र के 52 से 53 किसान व युवा मीठी क्रांति से जुड़ चुके हैं।

जोखिम उठाकर ली योजना की राह, सवा महीने में पास हुआ 1.40 लाख का लोन
अनुज सिंह की सफलता की नींव उनके गांव के ही एक पूर्ववर्ती मधुमक्खी पालक से मिली प्रेरणा से पड़ी। गांव के साथी से योजना और व्यवसाय की बारीकियां समझने के बाद उन्होंने खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड के माध्यम से ‘मुख्यमंत्री ग्रामोद्योग रोजगार योजना’ में आवेदन किया। हालांकि आवेदन प्रक्रिया के दौरान जमीन के अभिलेख (कागज) जमा कराने की शर्त पर पिताजी ने कुछ संकोच व्यक्त करते हुए मना किया था, लेकिन अनुज ने पूर्ण आत्मविश्वास के साथ स्वयं बैंक किश्तें चुकाने की जिम्मेदारी उठाई। महज एक से सवा महीने की अल्पावधि में उनका 1.40 लाख रुपये का ऋण स्वीकृत हो गया, जिससे उनके सपनों को पंख मिले।

एपिस मेलिफेरा प्रजाति से शुरुआत, 550 रुपये के बॉक्स व 352 रुपये के छत्ते से बुना ढांचा
ऋण राशि प्राप्त होते ही अनुज ने व्यावसायिक स्तर पर मधुमक्खी पालन का ढांचा तैयार किया। उन्होंने भारत में सबसे अधिक पाली जाने वाली उन्नत प्रजाति ‘एपिस मेलिफेरा’ (Epis Mellifera) का चयन किया। शुरुआती लागत में उन्होंने 500 से 550 रुपये प्रति बॉक्स की दर से खाली लकड़ी के बॉक्स, 352 रुपये प्रति छत्ते की दर से मधुमक्खी छत्ते और 80 से 90 रुपये प्रति स्टैंड की दर से लोहे के स्टैंड खरीदे। इसके अलावा लेबर और परिवहन (गाड़ी भाड़ा) का प्रबंध कर उन्होंने व्यवस्थित तरीके से फार्म स्थापित किया।

4 महीने का मुख्य सीजन, अक्टूबर से फरवरी के बीच प्रति बॉक्स 8 से 10 किलो शहद निष्कर्षण
मधुमक्खी पालन के उत्पादन चक्र की जानकारी देते हुए अनुज बताते हैं कि शहद का मुख्य सीजन अक्टूबर से फरवरी तक कुल 4 महीने चलता है। इस अनुकूल मौसम में प्राकृतिक फूलों से परागण कर मधुमक्खियां प्रचुर मात्रा में शहद तैयार करती हैं। सही मौसम और बेहतर फ्लावरिंग मिलने पर प्रति बॉक्स 8 से 10 किलोग्राम तक गुणवत्तापूर्ण शुद्ध शहद प्राप्त होता है। वर्तमान में उनके पास 65 बॉक्स कार्यरत हैं, जिनसे सीजन के दौरान क्विंटल के हिसाब से शहद का उत्पादन होता है।

मक्का, बाजरा से लाई-सरसों के खेतों तक माइग्रेशन, ऑफ-सीजन में चीनी के घोल पर टिकती हैं मक्खियां
शहद की गुणवत्ता और मक्खियों के स्वास्थ्य के लिए माइग्रेशन (स्थान परिवर्तन) बेहद महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। अनुज मौसम और फसलों के चक्र के अनुसार अपने बॉक्सों को विभिन्न खेतों में स्थानांतरित करते हैं। शुरुआती दिनों में मक्का और बाजरा के खेतों में बॉक्स रखे जाते हैं, जबकि नवंबर माह शुरू होते ही गांव और आसपास के लाई व सरसों के लहलहाते खेतों के पास बॉक्स स्थापित कर दिए जाते हैं।

रामपुर से बाहर तक आपूर्ति, जीएसटी पंजीकृत व्यापारी के जरिए 82 रुपये प्रति किलो में बिक्री
उत्पादित शहद के विपणन और बिक्री के लिए अनुज ने एक सुदृढ़ व्यापारिक तंत्र विकसित किया है। वे अपना शहद ऑल इंडिया जीएसटी पंजीकृत व्यापारी जगदीश कुमार के माध्यम से बेचते हैं, जिन्होंने उन्हें इस कार्य का प्रशिक्षण भी दिया था। बाजार में 85 रुपये प्रति किलोग्राम के चल रहे थोक भाव के मुकाबले वे 80 से 82 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से थोक आपूर्ति करते हैं। जगदीश कुमार गाड़ी लोड करवाकर इस शहद को रामपुर जिले से बाहर विभिन्न राज्यों और महानगरों में भेजते हैं।

कीटनाशकों का छिड़काव और अनिश्चित मूल्य बनी बड़ी चुनौती, हार न मानने के जज्बे से पाई सफलता
इस व्यवसाय में आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों का उल्लेख करते हुए अनुज कहते हैं कि बाजार में शहद का समर्थन मूल्य तय न होना और बिचौलियों का प्रभाव बड़ी बाधा है। इससे भी गंभीर समस्या आसपास के किसानों द्वारा फसलों में कीड़ों और मऊ (लाही कीट) से बचाव के लिए किए जाने वाले जहरीले रासायनिक कीटनाशक स्प्रे से होती है। कीटनाशकों के प्रभाव से कई बार मधुमक्खियों के पूरे बॉक्स खत्म हो जाते हैं, जिससे भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। पहली साल मुनाफे के बाद दूसरी साल घाटा हुआ, लेकिन उन्होंने खेती की तरह इसे प्राकृतिक जोखिम मानकर काम बंद नहीं किया और निरंतर डटे रहे।

बच्चों की पढ़ाई और सामाजिक प्रतिष्ठा में सुधार, मेरठ प्रदर्शनी से लेकर जेके हनी ब्रांड तक पहचान
योजना से जुड़ने के बाद अनुज के पारिवारिक और सामाजिक जीवन में व्यापक बदलाव आया है। आर्थिक स्थिति सुधरने से बच्चों की स्कूल फीस समय पर जमा हो रही है और घरेलू जरूरतों की पूर्ति सहजता से हो रही है। व्यवसाय के सिलसिले में उन्हें दूर-दराज के क्षेत्रों में जाने, प्रबुद्ध लोगों से मिलने और सामाजिक दायरा बढ़ाने का अवसर मिला। वे अपने साथी के ब्रांड ‘जेके हनी’ के साथ सरकारी प्रदर्शनियों में भाग लेते हैं। वे मेरठ स्थित सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय

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