रामपुर रज़ा पुस्तकालय में मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती पर दुर्लभ पुस्तकों व छायाचित्रों की विशेष प्रदर्शनी
रामपुर रज़ा पुस्तकालय में हिंदी साहित्य के महान कथाकार एवं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष प्रदर्शनी का उद्घाटन पुस्तकालय के निदेशक डॉ. पुष्कर मिश्र के करकमलों द्वारा संपन्न हुआ। इस अवसर पर पुस्तकालय के निदेशक डॉ. पुष्कर ने अपने संबोधन में कहा कि रामपुर रज़ा पुस्तकालय में विशेष अवसरों पर निरंतर प्रदर्शनियों का आयोजन किया जाता है। उसी क्रम में आज मुंशी प्रेमचंद जी की 146वीं जयंती के अवसर पर इस प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है। उन्होंने कहा कि मुंशी प्रेमचंद साहित्य की दुनिया के बहुत बड़े व्यक्तित्व थे, यह हम सभी जानते हैं। उनका जन्म काशी में हुआ और वहीं उनकी साहित्य-सर्जना का विस्तार हुआ।
मानव इतिहास में बहुत कम साहित्यकार ऐसे होते हैं, जो अपना प्रभाव लंबे समय तक छोड़ते हैं। लगभग 100 वर्ष हो गए हैं, जब मुंशी प्रेमचंद लिखा करते थे, तब से लेकर आज तक उनकी प्रासंगिकता उतनी ही है, जितनी 100 वर्ष पूर्व थी। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि मानव जीवन के जो मूल प्रश्न हैं, उन प्रश्नों पर उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से अपनी टिप्पणियाँ दीं। ऐसे साहित्यकार बहुत कम होते हैं, जो मानवीय संवेदनाओं, उनके अंतर्मन में चल रहे द्वंद्वों तथा सामाजिक संरचना को इतनी भलीभाँति प्रस्तुत कर सकें। मुंशी प्रेमचंद जी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उनकी कहानियाँ सामाजिक ताने-बाने में बुनी हुई होती थीं। इसलिए हम उनके किसी भी उपन्यास, कहानी, निबंध अथवा अन्य लेखन को पढ़ें, तो तत्कालीन समाज के आचार, विचार, व्यवहार और संस्कार उसमें स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ते हैं। उसी ताने-बाने में उनके उपन्यासों और कहानियों के पात्र किस प्रकार संघर्ष करते हैं और उन परिस्थितियों से कैसे निकलते हैं, इसका सजीव चित्रण भी उसमें मिलता है।

उन्होंने कहा कि मुंशी प्रेमचंद यथार्थवादी लेखक माने जाते थे और उन्हें अति-यथार्थवादी भी कहा जा सकता है। इसके पीछे कारण यह है कि साहित्य में कई बार अतिरंजना और अतिशयोक्ति हो जाती है, जिसके कारण यथार्थ, अति-यथार्थ में परिवर्तित हो जाता है। उस समय की समसामयिक विचारधाराओं का प्रभाव लेखक पर पड़ता है, जिसका प्रभाव प्रेमचंद जी पर भी पड़ा। लेकिन मानवीय अंतर्संबंधों की जितनी गहरी समझ उनके पास थी, उतनी शायद ही किसी और के पास रही हो, और यही बात प्रेमचंद जी को महान बनाती है। उन्होंने आगे कहा कि किसी भी महापुरुष की जयंती मनाने का उद्देश्य यह होता है कि हम उसके जीवन और चरित्र से कुछ सीखें। मुंशी प्रेमचंद जी के जीवन से हमें संवेदना की शिक्षा मिलती है। हमें यह शिक्षा मिलती है कि कर्मठता के साथ अपने ध्येय अथवा अपने कर्म का पूरी निष्ठा से पालन करें और अपना शत-प्रतिशत योगदान दें।

मुंशी प्रेमचंद ने अपनी पारिवारिक अथवा आर्थिक परिस्थितियाँ जैसी भी रही हों, कभी अपनी कर्मठता का त्याग नहीं किया। वे निरंतर लिखते रहे और आज उनका लेखन जिस प्रकार वर्तमान पीढ़ी के मानस को समृद्ध कर रहा है, उसी प्रकार आने वाली पीढ़ियों के मानस को भी समृद्ध करता रहेगा। उन्होंने कहा कि यदि हम विश्व के गिने-चुने महान साहित्यकारों की सूची बनाएँ, तो उसमें निश्चित रूप से मुंशी प्रेमचंद जी का नाम सम्मिलित होगा।
इस विशेष प्रदर्शनी में मुंशी प्रेमचंद के साहित्य से संबंधित हिंदी एवं उर्दू की दुर्लभ पुस्तकों, उपन्यासों और कहानी-संग्रहों का प्रदर्शन किया गया है। इनमें गोदान, रंगभूमि, कर्मभूमि, गबन, कर्बला, प्रेमाश्रम, पूस की रात, बड़े घर की बेटी, नमक का दरोगा, प्रतिज्ञा, सेवासदन, कायाकल्प, स्त्री जीवन की कहानियाँ, प्रेमचंद के विचार, गांधी और प्रेमचंद तथा मुंशी प्रेमचंद के कथा-साहित्य में सामाजिक चेतना जैसे महत्वपूर्ण पुस्तकें शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त, प्रो. मृदुला सिन्हा, ललित कला विभाग, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी द्वारा मुंशी प्रेमचंद के जीवन एवं साहित्य पर आधारित निर्मित चित्रों को भी प्रदर्शनी में प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया है।
प्रदर्शनी में मुंशी प्रेमचंद के जीवन एवं साहित्यिक यात्रा से संबंधित अनेक दुर्लभ छायाचित्र एवं अभिलेख प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें वर्ष 1933 में अजन्ता सिनेटोन (मुंबई फिल्म कंपनी) के साथ उनके अनुबंध करते हुए, मुंशी प्रेमचंद निकेतन (जहाँ उन्होंने अपनी अनेक महत्वपूर्ण रचनाओं का सृजन किया) मारवाड़ी कॉलेज (जहाँ वे वर्ष 1931 में शिक्षक के रूप में कार्यरत रहे), तथा मुंशी प्रेमचंद का जयशंकर प्रसाद, ऋषभ चरण जैन और जैनेन्द्र कुमार के साथ लिया गया दुर्लभ छायाचित्र विशेष आकर्षण का केंद्र हैं। इसके अतिरिक्त, उनकी जन्मपत्री तथा सेवा पुस्तिका भी प्रदर्शनी में प्रदर्शित की गई हैं।
यह विशेष प्रदर्शनी दिनांक 31 जुलाई, 2026 से 10 अगस्त, 2026 तक प्रातः 10: बजे से सायं 5: बजे तक पुस्तकालय के दरबार हॉल में आमजन के अवलोकन हेतु प्रदर्शित रहेगी।
इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम का सफल संचालन सचिन तिवारी द्वारा किया गया।
