‘सतलुज’ फिल्म को OTT से हटाना सच को दबाने की कोशिश: दल खालसा

'पंजाब 95' 80-90 के दशक की घटनाओं पर आधारित, फिल्म से डर रही है केंद्र सरकार: कंवरपाल सिंह बिट्टू

-फिल्म पर प्रतिबंध लगाने के बजाय लोगों को सच जानने का मौका मिलना चाहिए: दल खालसा

-72 घंटे में दुनिया भर तक पहुंची फिल्म, अब इसे रोकना संभव नहीं: बिट्टू

  • रिपोर्ट: ललित शर्मा

अमृतसर। दल खालसा के नेता कंवरपाल सिंह बिट्टू ने मीडिया से बातचीत करते हुए अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ (पूर्व नाम ‘पंजाब 95’) को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि इस फिल्म को पिछले तीन वर्षों से रिलीज नहीं होने दिया जा रहा था और जब इसे ओटीटी पर जारी किया गया तो कुछ ही घंटों बाद हटा दिया गया। उन्होंने इसे सच को दबाने की कोशिश बताया।

कंवरपाल सिंह बिट्टू ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार को इस बात का डर है कि फिल्म के माध्यम से पंजाब के 1980 और 1990 के दशक की घटनाएं दुनिया के सामने आ जाएंगी। उन्होंने कहा कि फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता भाई जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और उस दौर की परिस्थितियों पर आधारित है। उनका दावा था कि उस समय कथित तौर पर लोगों के लापता होने, फर्जी मुठभेड़ों और मानवाधिकार उल्लंघन जैसे मुद्दों को फिल्म में दिखाया गया है और इसी कारण इसे रोका गया।

उन्होंने कहा कि कुछ लोगों का कहना है कि इस फिल्म से माहौल खराब हो सकता है, लेकिन उनके अनुसार किसी भी ऐतिहासिक घटना की जानकारी लोगों तक पहुंचना जरूरी है। उन्होंने कहा कि यदि कोई फिल्म इतिहास के किसी दौर की घटनाओं को सामने लाती है तो उस पर प्रतिबंध लगाने के बजाय लोगों को उसे देखने और अपनी राय बनाने का अवसर दिया जाना चाहिए।

बिट्टू ने दावा किया कि फिल्म को हटाए जाने के बावजूद यह बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच चुकी है। उन्होंने कहा कि रिलीज होने के कुछ ही समय में लोगों ने इसे अपने मोबाइल फोन पर डाउनलोड कर लिया और अब यह दुनिया के कई देशों तक पहुंच रही है। उनका कहना था कि इस मामले की जानकारी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहुंच रही है।

दल खालसा नेता ने कहा कि किसी भी फिल्म या विचार को प्रतिबंध लगाकर रोकने के बजाय लोगों को सच्चाई जानने और अपनी सोच विकसित करने की आजादी मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इतिहास से जुड़े मुद्दों पर खुली चर्चा लोकतंत्र का हिस्सा है और ऐसी रचनाओं पर रोक लगाने से विवाद और बढ़ते हैं।

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