- – डॉ. अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)
भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि यहाँ सत्ता के शीर्ष पर होने वाली नियुक्तियाँ केवल योग्यता का पैमाना नहीं होतीं, बल्कि वे भविष्य के दशकों की राजनीति तय करने वाले सुनियोजित समीकरण होते हैं। वर्ष 2027 में वर्तमान राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू का कार्यकाल पूर्ण होने जा रहा है। जैसे-जैसे यह समय निकट आ रहा है, दिल्ली के सियासी गलियारों से लेकर पटना की गलियों तक एक ही चर्चा सबसे ऊपर है कि क्या बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान राज्यसभा सांसद नीतीश कुमार देश के अगले महामहिम होंगे? जब हम वर्तमान परिस्थितियों और भविष्य की संभावनाओं का विश्लेषण करते हैं, तो नीतीश कुमार का नाम महज़ एक विकल्प नहीं, बल्कि एक रणनीतिक आवश्यकता के रूप में उभरता दिखाई देता है।
नीतीश कुमार के पक्ष में सबसे बड़ी दलील उनका विशाल प्रशासनिक अनुभव और बेदाग छवि है। भारतीय राजनीति में सुशासन बाबू के नाम से अपनी पहचान बनाने वाले नीतीश कुमार ने बिहार जैसे जटिल राज्य को एक नई दिशा दी। उनके पास दशकों का विधायी अनुभव है जहाँ वे रेल मंत्री, कृषि मंत्री और मुख्यमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं। वर्तमान में राज्यसभा सदस्य के रूप में उनकी दिल्ली में मौजूदगी इस बात का संकेत है कि वे राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा में पूरी तरह सक्रिय हैं। राष्ट्रपति पद के लिए एक ऐसे व्यक्तित्व की आवश्यकता होती है जो संविधान की मर्यादाओं को समझे और जिसके नाम पर राजनीतिक मतभेद कम से कम हों। नीतीश कुमार की स्वीकार्यता जिस तरह से एनडीए और समय-समय पर विपक्षी दलों के बीच रही है, वह उन्हें इस पद के लिए एक सर्वसम्मत चेहरे के रूप में स्थापित करती है।
यदि हम 2027 के राजनीतिक समीकरणों को देखें, तो भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के लिए नीतीश कुमार को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाना एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकता है। 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद देश में गठबंधन की राजनीति का एक नया दौर शुरू हुआ है। इस दौर में नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड, केंद्र सरकार के स्थायित्व के लिए एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। भाजपा हमेशा से अपने सहयोगियों को सम्मान देने और सामाजिक समीकरणों को साधने के लिए जानी जाती रही है। नीतीश कुमार को रायसीना हिल्स भेजकर भाजपा न केवल बिहार में अपनी स्थिति को और अधिक मजबूत कर सकती है, बल्कि पूरे देश के पिछड़ा वर्ग और अति-पिछड़ा वर्ग को यह बड़ा संदेश दे सकती है कि गठबंधन में उनके नेताओं का सर्वोच्च सम्मान सुरक्षित है।
इसके अलावा, राष्ट्रपति चुनाव के इलेक्टोरल कॉलेज के गणित को समझना भी अनिवार्य है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की इसमें बड़ी भूमिका होती है। नीतीश कुमार के नाम पर हिंदी पट्टी के राज्यों के साथ-साथ ओडिशा, आंध्र प्रदेश और यहाँ तक कि दक्षिण के कुछ दलों का समर्थन हासिल करना एनडीए के लिए आसान होगा। नीतीश कुमार की छवि एक गंभीर और विजनरी राजनेता की रही है, जिन्होंने कभी भी वैचारिक मतभेदों को व्यक्तिगत शत्रुता में नहीं बदलने दिया। यही कारण है कि यदि उनका नाम आगे बढ़ाया जाता है, तो विपक्ष के लिए भी उनके विरोध का कोई ठोस आधार खोजना मुश्किल होगा।
एक और महत्वपूर्ण पहलू मिशन 2029 भी है। 2027 का राष्ट्रपति चुनाव 2029 के आम चुनावों से ठीक पहले का एक बड़ा शक्ति प्रदर्शन होगा। नीतीश कुमार को इस पद पर आसीन करना बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत करेगा, जहाँ भाजपा और जेडीयू के बीच नेतृत्व के हस्तांतरण की प्रक्रिया और अधिक सुगम हो सकती है। यह कदम बिहार की जनता के लिए एक भावनात्मक गौरव का विषय भी होगा कि उनके प्रदेश का एक मिट्टी का लाल देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की शोभा बढ़ा रहा है।
और अधिक आसान शब्दों में समझें तो राजनीति, संभावनाओं का खेल है और नीतीश कुमार इस खेल के मंझे हुए खिलाड़ी हैं। उनके राज्यसभा जाने के फैसले को कई विश्लेषकों ने उनके रिटायरमेंट की शुरुआत माना था, लेकिन असल में यह उनकी एक बड़ी राष्ट्रीय भूमिका की तैयारी हो सकती है। 2027 में जब देश नए राष्ट्रपति का चुनाव करेगा, तब नीतीश कुमार का अनुभव, उनका जातिगत आधार और उनकी गठबंधन धर्म को निभाने की कुशलता उन्हें सबसे प्रबल दावेदार बनाएगी। यदि ऐसा होता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक सुखद अध्याय होगा, जहाँ एक अनुभवी प्रशासक संविधान के संरक्षक के रूप में देश का मार्गदर्शन करेगा।
