Supreme Court on Women Journalists: महिला पत्रकारों की सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, जांच समिति बनाने का सुझाव

Supreme Court on Women Journalists: दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन और मार्च की कवरेज के दौरान महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 को हुई सुनवाई में पत्रकारों की सुरक्षा, पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शन स्थलों पर मीडिया के काम करने के अधिकार से जुड़े मुद्दे उठे। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि आज के समय में यह पहचानना आसान नहीं है कि वीडियो रिकॉर्ड कर रहा व्यक्ति पत्रकार है या सोशल मीडिया पर रील बनाने के लिए रिकॉर्डिंग कर रहा है। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने महिला पत्रकारों के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार की जांच के लिए एक समिति गठित करने का सुझाव दिया।

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Supreme Court on Women Journalists: महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार का मामला क्या है?

दिल्ली में हाल में हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान कुछ महिला पत्रकारों ने आरोप लगाया था कि रिपोर्टिंग करते समय उनके साथ बदसलूकी की गई और उन्हें अपना काम करने में परेशानी का सामना करना पड़ा। मामले में पत्रकारों की सुरक्षा और पुलिस के व्यवहार को लेकर अदालत में याचिका दायर की गई। याचिका में मांग की गई कि पत्रकारों को प्रदर्शन स्थलों पर रिपोर्टिंग करते समय सुरक्षा मिले और उनके साथ मनमानी कार्रवाई न हो।

पत्रकारों का काम केवल घटनाओं की जानकारी जुटाना ही नहीं, बल्कि आम लोगों तक सही और समय पर खबर पहुंचाना भी है। इसके लिए उन्हें कई बार भीड़, तनावपूर्ण माहौल और विरोध-प्रदर्शन वाली जगहों पर मौजूद रहना पड़ता है। ऐसे हालात में उनकी सुरक्षा और स्वतंत्र रूप से काम करने का अधिकार अहम हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान इसी मुद्दे पर बहस हुई कि प्रदर्शन स्थलों पर पत्रकारों के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए और उनकी पहचान व काम को लेकर पुलिस तथा अन्य अधिकारियों की क्या जिम्मेदारी होनी चाहिए।

Supreme Court on Women Journalists: तुषार मेहता ने पत्रकारों और रील मेकर्स की पहचान पर क्या कहा?

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मौजूदा तकनीकी दौर में किसी व्यक्ति की पहचान करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। उनके मुताबिक, कई लोग हाथ में माइक लेकर रिकॉर्डिंग करते हैं और बाद में उस वीडियो को सोशल मीडिया पर रील के रूप में अपलोड कर देते हैं। ऐसे में यह समझना मुश्किल हो सकता है कि कौन स्वतंत्र पत्रकार है और कौन केवल सोशल मीडिया सामग्री बनाने के लिए वीडियो रिकॉर्ड कर रहा है।

मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल से अब बड़ी संख्या में लोग घटनाओं के वीडियो बनाकर सार्वजनिक मंचों पर साझा करते हैं। दूसरी ओर, पेशेवर पत्रकार भी मोबाइल फोन, कैमरे और माइक्रोफोन की मदद से खबरें रिकॉर्ड करते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति के हाथ में मोबाइल या माइक होने से ही उसके काम की प्रकृति का पता लगाना हमेशा आसान नहीं होता।

हालांकि, सुनवाई में पत्रकारों की पहचान को लेकर उठी दलील के साथ एक व्यापक सवाल भी जुड़ा है—क्या किसी व्यक्ति की पहचान स्पष्ट न होने की स्थिति में उसके साथ अनुचित व्यवहार किया जा सकता है? प्रदर्शन स्थल पर शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन किसी भी कार्रवाई में कानून और नागरिक अधिकारों का ध्यान रखा जाना जरूरी है।

Supreme Court on Women Journalists: इंदिरा जयसिंह ने महिला अध्यक्ष वाली समिति का दिया सुझाव

वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अदालत में कहा कि जिन महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार हुआ, वे वहां अपना पेशेवर काम कर रही थीं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पत्रकारों को रिपोर्टिंग करने और अपना काम करने का अधिकार है। उनके मुताबिक, मामले में अंतरिम निर्देश दिए जाने की जरूरत है, ताकि पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़े सवालों पर उचित कार्रवाई हो सके।

जयसिंह ने इस मामले की जांच के लिए एक समिति गठित करने का सुझाव भी दिया। उन्होंने कहा कि समिति की अध्यक्ष महिला होनी चाहिए। समिति में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों और मौजूदा या सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों को शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया। उन्होंने यह भी बताया कि समिति के लिए कुछ नाम सुझाए जा सकते हैं।

इस तरह की समिति का उद्देश्य शिकायतों और उपलब्ध तथ्यों की जांच करना, घटनाओं से संबंधित परिस्थितियों को समझना और जिम्मेदारी तय करने में मदद करना हो सकता है। हालांकि, समिति के गठन और उसके अंतिम स्वरूप को लेकर अदालत की प्रक्रिया तथा आगे आने वाले आदेश महत्वपूर्ण होंगे।

Supreme Court on Women Journalists: सुप्रीम कोर्ट ने CCTV फुटेज और डिजिटल सबूत सुरक्षित रखने को कहा

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कानून लागू कराने वाली एजेंसियों को निर्देश दिया कि उनके पास मौजूद सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल सबूत सुरक्षित रखे जाएं। निजी पक्षों को भी संबंधित सबूत जमा करने की अनुमति दी गई है।

इस निर्देश का महत्व इसलिए है क्योंकि प्रदर्शन स्थल पर हुई किसी घटना की जांच में वीडियो रिकॉर्डिंग, सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल सामग्री अहम भूमिका निभा सकती है। ऐसे साक्ष्य से यह समझने में मदद मिल सकती है कि घटनाक्रम किस तरह हुआ, वहां कौन-कौन मौजूद था और संबंधित पक्षों के बीच क्या स्थिति बनी।

डिजिटल सबूतों को सुरक्षित रखना निष्पक्ष जांच की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होता है। यदि किसी घटना की रिकॉर्डिंग समय पर सुरक्षित नहीं रखी जाती, तो बाद में तथ्यों का सत्यापन कठिन हो सकता है। हालांकि, किसी भी रिकॉर्डिंग या डिजिटल सामग्री के आधार पर निष्कर्ष निकालने से पहले उसकी प्रामाणिकता और संदर्भ की जांच आवश्यक होती है।

अदालत का निर्देश इस बात पर जोर देता है कि मामले से संबंधित उपलब्ध सामग्री को सुरक्षित रखा जाए, ताकि आगे की न्यायिक प्रक्रिया में जरूरत पड़ने पर उसका इस्तेमाल किया जा सके।

Supreme Court on Women Journalists: BNSS की धारा 172 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर नोटिस

इस सुनवाई का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 172 से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर नोटिस जारी किया।

धारा 172 का संबंध पुलिस अधिकारियों द्वारा कानून के तहत दिए गए निर्देशों के पालन से है। इसके तहत लोगों को पुलिस के वैध निर्देशों का पालन करना होता है। निर्देशों का उल्लंघन होने की स्थिति में कानून के अनुसार हिरासत या गिरफ्तारी जैसी कार्रवाई का सवाल उठ सकता है।

इस प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिकाओं में इसकी संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। नोटिस जारी होने का अर्थ यह है कि अदालत ने संबंधित पक्षों से मामले पर जवाब मांगा है। इसे धारा को असंवैधानिक घोषित करने या चुनौती को स्वीकार कर लेने का अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए। इस मुद्दे पर आगे की सुनवाई और अदालत का अंतिम आदेश महत्वपूर्ण होगा।

Supreme Court on Women Journalists: पत्रकारों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन जरूरी

प्रदर्शन और मार्च लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं। इनकी रिपोर्टिंग करते समय पत्रकारों को घटनास्थल पर मौजूद रहना पड़ सकता है। वहीं, पुलिस की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की होती है। ऐसे में जरूरी है कि कानून लागू करने की प्रक्रिया स्पष्ट हो और पत्रकारों को अपना काम करने में अनुचित बाधाओं का सामना न करना पड़े।

महिला पत्रकारों से जुड़े इस मामले ने विशेष रूप से सुरक्षा, कथित दुर्व्यवहार की जांच और पेशेवर जिम्मेदारियों के सवालों को सामने रखा है। अदालत में समिति बनाने का सुझाव, डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने का निर्देश और BNSS की धारा 172 पर नोटिस—ये सभी पहलू आगे की कार्यवाही में अहम हो सकते हैं।

फिलहाल, मामले में अदालत की आगे की सुनवाई और संबंधित पक्षों के जवाब पर नजर रहेगी। सुप्रीम कोर्ट के आगामी निर्देश यह स्पष्ट करने में मदद कर सकते हैं कि प्रदर्शन स्थलों पर पत्रकारों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े सवालों से किस तरह निपटा जाएगा।

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