गुरुग्राम पुलिस को धिक्कार..सुप्रीम कोर्ट के चाबुक के बाद चार साल की ग़रीब बच्ची से सेक्सुअल असॉल्ट के मामले में लिया एक्शन

ग़ुस्ताख़ी माफ़ हरियाणा: पवन कुमार बंसल

गुरुग्राम पुलिस को धिकार..सुप्रीम कोर्ट के “चाबुक” के बाद जागी गुरुग्राम पुलिस, तीन आरोपी गिरफ़्तार

गुरुग्राम में चार साल की मासूम बच्ची के साथ हुए कथित यौन उत्पीड़न के मामले ने एक बार फिर कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि घटना के बाद स्थानीय पुलिस लंबे समय तक ठोस कार्रवाई करने में नाकाम रही।
मामले ने तब नया मोड़ लिया जब वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने इसे सीधे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठाया। उन्होंने यह मामला मुख्य न्यायाधीश जस्टीस सूर्य कांत के सामने प्रस्तुत किया।
प्रारंभ में अदालत ने याचिकाकर्ता को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट जाने की सलाह दी, लेकिन रोहतगी ने दलील दी कि पीड़ित पक्ष को इसके लिए गुरुग्राम से चंडीगढ़ तक जाना पड़ेगा, जिससे न्याय में देरी हो सकती है। इस तर्क को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी और मामले को सोमवार के लिए सूचीबद्ध कर दिया।
जैसे ही सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की मंजूरी दी, स्थानीय पुलिस हरकत में आ गई। आनन-फानन में तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया।
यह घटनाक्रम उस पुरानी कहावत को चरितार्थ करता दिख रहा है—“जब रंज दिया बुतों ने, तो खुदा याद आया।” सवाल यह उठता है कि यदि पुलिस केवल अदालत के दबाव में ही सक्रिय होती है, तो उसकी स्वायत्त भूमिका और जवाबदेही का क्या अर्थ रह जाता है?
यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न है। सरकार की बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी पहल तब तक प्रभावी नहीं मानी जा सकतीं, जब तक जमीनी स्तर पर सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित न हो।
लाख टके का सवाल यही है—क्या आम नागरिक को न्याय के लिए हर बार सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा, या स्थानीय तंत्र अपनी जिम्मेदारी स्वयं निभाएगा?

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