रायपुर: छत्तीसगढ़ में किसानों की आमदनी बढ़ाने और पारंपरिक खेती के साथ नई फसलों को जोड़ने की दिशा में पचौली की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। सुगंधित और औषधीय गुणों वाले इस पौधे की पत्तियों से मिलने वाले तेल की बाजार में मांग है। राज्य में इसके लिए करीब 8 एकड़ भूमि पर प्रायोगिक परियोजना शुरू की गई है। बेहतर परिणाम मिलने पर इसकी खेती को बड़े स्तर पर बढ़ावा देने की योजना है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में शुरू हुई पहल
इस प्रायोगिक परियोजना को मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में शुरू किया गया है। छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड (वन विभाग) की ओर से करीब 8 एकड़ में पचौली की खेती की जा रही है।
पचौली की खेती क्यों है खास?
पचौली एक सुगंधित और औषधीय पौधा है। इसकी पत्तियों से निकलने वाले तेल का इस्तेमाल इत्र, परफ्यूम, साबुन, कॉस्मेटिक्स, अरोमाथेरेपी और प्राकृतिक कीट-रोधक उत्पादों में किया जाता है। देश के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी पचौली ऑयल की मांग बताई गई है।
इस खेती में रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक खाद का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार गोबर, गोमूत्र और गुड़ से तैयार जीवामृत का उपयोग पौधों की वृद्धि और मिट्टी की सेहत के लिए किया जा रहा है।
1 एकड़ से ₹1.5 लाख तक मुनाफे की संभावना
पचौली की खेती की सबसे बड़ी खासियत इसकी आय की संभावना बताई जा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार एक एकड़ में करीब 30 किलो तक तेल का उत्पादन हो सकता है। बाजार भाव करीब ₹6,000 प्रति लीटर तक रहने की स्थिति में लागत निकालने के बाद पहले साल करीब ₹1 लाख से ₹1.5 लाख तक शुद्ध मुनाफे की संभावना बताई गई है।
हालांकि वास्तविक कमाई उत्पादन, तेल की रिकवरी, बाजार भाव और खेती की लागत पर निर्भर करेगी।
साल में 2 से 3 बार हो सकती है कटाई
पचौली की खेती में एक और खास बात यह है कि इसकी साल में 2 से 3 बार कटाई की जा सकती है। इससे किसानों को एक ही फसल से बार-बार आय प्राप्त करने का अवसर मिलता है। एक बार पौधे खेत में स्थापित हो जाने के बाद पुराने पौधों से आगे की रोपण सामग्री भी तैयार की जा सकती है, जिससे बार-बार महंगी रोपण सामग्री खरीदने की जरूरत कम होती है।
बगीचों के बीच भी कर सकते हैं खेती
पचौली की खेती के लिए अलग से पूरी जमीन होना जरूरी नहीं बताया गया है। इसे खुले खेत के अलावा फलदार बगीचों, नारियल और सुपारी के बागानों के बीच खाली जगह में भी लगाया जा सकता है। इस तरह किसान अपनी मौजूदा खेती के साथ इसे जोड़कर अतिरिक्त आमदनी का विकल्प बना सकते हैं।
जुलाई-अगस्त में रोपाई का समय
पचौली के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु को अनुकूल माना जाता है। रिपोर्ट के अनुसार जुलाई-अगस्त इसकी रोपाई के लिए उपयुक्त समय है। उत्पादन और गुणवत्ता बेहतर करने के लिए ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। रोपाई के करीब 4 से 6 महीने बाद पहली कटाई की जाती है। इसके बाद पत्तियों से स्टीम डिस्टिलेशन प्रक्रिया के जरिए तेल निकाला जाता है।
30-40 एकड़ के क्लस्टर से बाजार आसान
अगर किसान व्यक्तिगत स्तर के बजाय समूह या 30 से 40 एकड़ के क्लस्टर में पचौली की खेती करते हैं, तो बड़ी कंपनियों के सीधे खेतों से उपज खरीदने की संभावना बढ़ सकती है। इससे बाजार तक पहुंच और उचित मूल्य हासिल करने में मदद मिल सकती है। औषधि पादप बोर्ड की ओर से किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और विपणन सहायता उपलब्ध कराने की पहल की जा रही है।
सफल हुआ प्रयोग तो बढ़ेगा दायरा
छत्तीसगढ़ में शुरू किया गया 8 एकड़ का प्रायोगिक प्रोजेक्ट सफल रहता है तो आने वाले समय में पचौली की खेती का दायरा बढ़ाया जा सकता है। इससे किसानों की आय बढ़ाने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, प्रसंस्करण और सुगंधित-औषधीय उत्पादों से जुड़े नए कारोबार के अवसर भी विकसित होने की संभावना है।
