कानून और संविधान की व्याख्या समाज की जरूरतों के अनुसार होनी चाहिए: CJI गवई

मुंबई, 5 जुलाई: भारत के मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई ने शनिवार को कहा कि कानून या संविधान की व्याख्या समाज की मौजूदा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए व्यावहारिक (प्रैगमैटिक) तरीके से की जानी चाहिए।

बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा आयोजित एक सम्मान समारोह में बोलते हुए, उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों को अपने निर्णय पर अडिग रहना चाहिए और एक बार मामला निपट जाने के बाद उससे अलग हो जाना चाहिए।

CJI गवई ने कहा:

“किसी भी कानून या संविधान की व्याख्या वर्तमान पीढ़ी की समस्याओं के संदर्भ में की जानी चाहिए। व्याख्या व्यावहारिक होनी चाहिए, जो समाज की जरूरतों के अनुकूल हो।”

उन्होंने यह भी बताया कि हाल ही में उन्हें कुछ न्यायाधीशों के अभद्र व्यवहार को लेकर शिकायतें मिली हैं। इस पर उन्होंने सभी न्यायाधीशों से अपील की कि वे न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को बनाए रखें।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर स्पष्ट रुख
CJI ने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के दौरान न्यायपालिका की स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में नियुक्तियों के दौरान योग्यता के साथ विविधता और समावेशिता का भी ध्यान रखा जाता है।

न्यायाधीशों को सलाह देते हुए उन्होंने कहा:

“न्यायाधीश होना 10 से 5 की नौकरी नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की सेवा का एक अवसर है। अपने पद की शपथ और प्रतिबद्धता के प्रति सच्चे रहें।”

बॉम्बे हाई कोर्ट की सराहना
उन्होंने अपने पूर्व कार्यस्थल बॉम्बे हाई कोर्ट की भी प्रशंसा करते हुए कहा कि जब लोग इसके फैसलों की सराहना करते हैं तो उन्हें गर्व होता है।

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