व्यंग: मिलिनिम सिटी गुरुग्राम की व्यथा..

गुस्ताख़ी माफ़ हरियाणा: पवन कुमार बंसल

मिलिनिम सिटी गुरुग्राम की व्यथा..

हमारे जागरूक पाठक अश्वनी के सौजन्य से, हिन्दी अनुवाद – धीरेन्द्र जी।

कांच के ऊँचे टावरों तले,
एक शहर सिसके, बदहले।
सूखी नदियाँ, प्यासी ज़मीन,
बूँदें लगे कोई मृगतृष्णा की छीन।

पहाड़ उगे, पर पत्थर नहीं,
कूड़े के ढेर, शहर की गिन।
लैंडफिल से उठती विषैली सांस,
उड़ते पंछी, बेबस, उदास।

गाढ़ी हवा, घुटती साँसें,
धूल और धुंआ, बेबस आशें।
इंजन गरजे, सड़कें चीखें,
शांत साँस लेना भी सीखें।

बादल आए, नभ ने रोया,
बाढ़ में डूबा हर एक कोना।
सड़कों की शक्ल घुलती गई,
ट्रैफिक की लहरें चलती नहीं।

बढ़ती इमारत, सिकुड़ते पथ,
चोरी हुई ज़मीन के दुख।
पेड़ कटे, छाँव खो गई,
शहर की रूह भी सो गई।

फिर भी आशा जलती है,
सपनों में किरण पलती है।
हाथ मिलें, आवाज़ उठे,
शायद धुंध से सूरज निकले।

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