संसद में समोसे की कीमत पर चर्चा, लेकिन प्राइवेट स्कूल की किताबों की कीमत पर चुप्पी

  • संवाददाता – मनोज कुमार यादव

देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी संसद में जब बहस का मुद्दा समोसे की कीमत बन जाए, तो यह न सिर्फ विडंबना है बल्कि आम जनता की प्राथमिकताओं के साथ एक क्रूर मज़ाक भी है। देश के करोड़ों माता-पिता जिनकी कमर प्राइवेट स्कूलों की किताबों, यूनिफॉर्म और अन्य फीसों ने तोड़ दी है, उस पर कोई सार्थक बहस नहीं होती।

आज देशभर के प्राइवेट स्कूल शिक्षा नहीं, व्यापार कर रहे हैं। किताबें और यूनिफॉर्म उन्हीं दुकानों से खरीदने का दबाव होता है, जिनसे स्कूल का निजी गठजोड़ होता है। किताबों की कीमतें MRP से भी कहीं ज़्यादा वसूली जाती हैं। यही नहीं, हर साल नया सिलेबस, नया पैटर्न और नई किताबों की अनिवार्यता बनाकर पुराने किताबों के उपयोग को भी असंभव बना दिया गया है। ये खुला शोषण है, लेकिन संसद की बहसों में इसका कोई स्थान नहीं।

कारण स्पष्ट हैं – बड़े-बड़े निजी स्कूलों के संचालक सत्ता से जुड़े होते हैं या उनके करीबी होते हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त मुनाफाखोरी पर बात करने से राजनैतिक चंदा बंद हो सकता है, इसलिए नेताओं को यह मुद्दा ‘महत्वहीन’ लगता है।

एक मजदूर, एक किसान या एक मध्यमवर्गीय परिवार, जब अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा देना चाहता है, तो सबसे बड़ा बोझ किताबों और स्कूल की फीस का पड़ता है।
सरकारी स्कूलों की हालत सुधारने के बजाय सरकारें निजी स्कूलों को बढ़ावा देती दिखती हैं।

अगर संसद में समोसे की कीमत पर चर्चा हो सकती है, तो किताबों की कीमत, शिक्षा की गुणवत्ता, और अभिभावकों के आर्थिक शोषण पर क्यों नहीं? क्या यह विषय लाखों परिवारों की चिंता से जुड़ा नहीं है?

समोसे की कीमतें कुछ सांसदों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन देश के भविष्य यानी बच्चों की शिक्षा और उस पर होने वाला शोषण कहीं अधिक गंभीर और व्यापक मुद्दा है। संसद को इस दिशा में अपनी प्राथमिकताएं तय करनी होंगी। जब तक शिक्षा को व्यापार नहीं बल्कि अधिकार की दृष्टि से नहीं देखा जाएगा, तब तक न तो समाज बदलेगा, न देश।

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