इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: डॉक्टर की बी-क्लास हिस्ट्रीशीट निरस्त, कहा- सिर्फ आपराधिक मामलों में नाम होना पर्याप्त नहीं
Prayagraj: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में वर्ष 2020 में एक डॉक्टर के खिलाफ खोली गई बी-क्लास हिस्ट्रीशीट को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि महज आपराधिक मामलों में नाम दर्ज होने से किसी व्यक्ति को पेशेवर अपराधी नहीं माना जा सकता। बी-क्लास हिस्ट्रीशीट खोलने के लिए पुलिस के पास ठोस सामग्री होनी चाहिए और उसे इस बात से संतुष्ट होना होगा कि संबंधित व्यक्ति पेशेवर अपराधी है तथा उसके खिलाफ लगातार निगरानी जरूरी है।
याचिकाकर्ता के खिलाफ मेजा थाने में आठ आपराधिक मामले दर्ज थे। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि इनमें एक मामले में अंतिम रिपोर्ट लग चुकी थी, जबकि कुछ मामलों में याचिकाकर्ता को जमानत मिल चुकी थी। एक अन्य मामले में समझौते के बाद हाईकोर्ट ने कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। वर्ष 2015 के एक गंभीर मामले में भी पुलिस ने याचिकाकर्ता को आरोपपत्र से बाहर कर दिया था।
कोर्ट ने यह भी पाया कि हिस्ट्रीशीट खोलने के प्रस्ताव से पहले करीब पांच वर्षों में याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई नया आपराधिक मामला दर्ज नहीं हुआ था। इसके बावजूद प्रयागराज के तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की ओर से 27 फरवरी 2020 को हिस्ट्रीशीट खोलने की मंजूरी दी गई थी।
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस विनियमावली के नियम 228 और 229 का उल्लेख करते हुए कहा कि बी-क्लास हिस्ट्रीशीट मुख्य रूप से पेशेवर अपराधियों के लिए होती है। चोरी, ठगी, जालसाजी, तस्करी और गुंडागर्दी जैसे अपराधों में पेशेवर तौर पर संलिप्त व्यक्ति इसके दायरे में आते हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का आक्रामक स्वभाव होना या अलग-अलग मामलों में फंसना मात्र उसे पेशेवर अपराधी की श्रेणी में रखने का आधार नहीं हो सकता। हिस्ट्रीशीट के कारण व्यक्ति पर लंबे समय तक निगरानी रखी जा सकती है और उसके आवागमन, गतिविधियों व आचरण की जानकारी पुलिस जुटा सकती है। इसलिए ऐसी कार्रवाई व्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता पर गंभीर प्रभाव डालती है। कोर्ट ने ठोस आधार के अभाव में हिस्ट्रीशीट को निरस्त कर दिया।
