अडानी का मिर्जापुर थर्मल पावर प्लांट निर्माण कार्य ठप, जनविरोध और मिलीभगत के आरोप

  • रिपोर्ट- संतोष देव गिरी

मिर्जापुर। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर (Mirzapur) में प्रस्तावित अडानी थर्मल पावर प्लांट का निर्माण कार्य अचानक रुक गया है। कुछ माह पूर्व तक यहां तेजी से बाउंड्रीवाल और प्लांट का निर्माण हो रहा था, परंतु ग्रामीणों का कहना है कि यह सब बिना वैध अनुमति और अधिकारियों की मिलीभगत से हुआ। आरोप है कि ज़िला स्तर के कई अधिकारी कंपनी के आर्थिक दबाव में आकर आंखें मूंद चुके हैं।

बीते 11 अप्रैल 2025 को हुई जनसुनवाई पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि उस समय ADM मिर्ज़ापुर और एक सत्ताधारी दल के विधायक मुख्य अतिथि थे और भीड़ कंपनी द्वारा भाड़े पर बुलवाई गई थी। यही नहीं, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) के चेयरमैन स्तर के अधिकारी और सोनभद्र जिले के कई अफसर भी कंपनी के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। आरोप है कि यह अधिकारी पर्यावरणीय स्वीकृति (Environmental Clearance) दिलाने में मदद कर रहे हैं और अपनी रिपोर्ट उच्च प्रबंधन को भेजकर कंपनी का पक्ष मजबूत कर रहे हैं। जनसुनवाई भी इन्हीं अधिकारियों की देखरेख में संपन्न हुई, जिससे उसकी निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगा है। ग्रामीणों और समाजसेवियों का कहना है कि कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा जब आरटीआई डाली गई और विरोध दर्ज कराया गया तो संबंधित अधिकारियों पर दबाव बढ़ा और बाद में ADM तथा मड़िहान रेंजर नेगी जी का तबादला कर दिया गया। नेगी जी ने कंपनी को जंगल के रास्ते से सामग्री ले जाने से रोका था।जानकारी के अनुसार कंपनी की मशीनरी और पाइपलाइन अब भी मड़िहान क्षेत्र में किराए की भूमि पर रखी है, लेकिन कार्य ठप पड़ा है। कंपनी के लोग लगातार अधिकारियों से संपर्क में हैं, फिर भी कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है। इस बीच कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जनसुनवाई की प्रक्रिया को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट (allahabad high court)  में याचिका दायर की है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि यह पावर प्लांट बनता है तो क्षेत्र में गंभीर समस्याएं खड़ी होंगी। कार्बन उत्सर्जन और फ्लाई ऐश से वातावरण प्रदूषित होगा, जंगल और प्राकृतिक धरोहर जैसे विंडमफाल जलप्रपात और अलोपीदरी खतरे में पड़ जाएंगे, खजुरी जलाशय से पानी की आपूर्ति प्रभावित होगी और 30 किलोमीटर के दायरे में रहना कठिन हो जाएगा। किसानों का आरोप है कि पूर्व में कंपनी ने उनकी ज़मीन औने-पौने दामों पर खरीद ली और जो लोग बेचने को तैयार नहीं थे, उन पर फर्जी मुकदमें दर्ज कराकर दबाव बनाया गया। गरीब व आदिवासी परिवार न्याय के लिए कोर्ट-कचहरी तक भी नहीं पहुंच पा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि एनजीटी के स्थगन आदेश के बाद भी निर्माण कार्य शुरू किया जाना यह दर्शाता है कि अधिकारी और कंपनी के बीच गहरी मिलीभगत है। बहरहाल, अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। कंपनी के वकीलों ने जहां इसका विरोध किया, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि पूरे मामले को NGT (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) से वापस लेकर सुप्रीम कोर्ट में लाया जाए। यह समाजसेवी संगठनों और ग्रामीणों की एक बड़ी जीत मानी जा रही है, क्योंकि उन्होंने अडानी जैसी बड़ी कंपनी को सीधे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। समाजसेवियों का कहना है कि यह केवल जमीन और पर्यावरण का प्रश्न नहीं है, बल्कि मिर्जापुर की लोकतांत्रिक आवाज़ और आने वाली पीढ़ियों के जीवन से जुड़ा हुआ संघर्ष है।

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