पहली बार 27 महीने पिता ने 22 महीने बेटे ने दूसरी बार 23 महीने पिता ने 17 महीने बेटे ने जेल की कैद में गुज़ारे…

और फिर दोनों को मिली 7 साल की सज़ा!, अब 17 नवंबर 2025 से बाप बेटे जेल में कैद हैँ

Rampur: सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं है—सवाल उस सियासत का है, जिसमें एक पिता और बेटे की जिंदगी वर्षों से अदालतों और जेलों के बीच झूलती रही है।

आज बात अब्दुल्लाह आज़म खान साहब की।

26 फरवरी 2020 को अब्दुल्लाह आज़म खान, उनके वालिद मोहम्मद आज़म खान और उनकी वालिदा तंज़ीन फ़ातिमा साहिबा ने जन्म प्रमाणपत्र से जुड़े मामले में आत्मसमर्पण किया। अब्दुल्लाह आज़म साहब जनवरी 2022 में जेल से बाहर आए, जबकि उनके वालिद आज़म खान साहब करीब 27 महीने बाद, 20 मई 2022 को सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम जमानत मिलने के बाद बाहर आए।

लेकिन मुश्किलों का सिलसिला यहीं नहीं रुका।

18 अक्टूबर 2023 को रामपुर की MP/MLA अदालत ने जन्म प्रमाणपत्र मामले में अब्दुल्लाह आज़म खान साहब , आज़म खान साहब और तंज़ीन फ़ातिमा साहिबा को सात-सात साल की सज़ा सुनाई। फैसले के बाद तीनों को न्यायिक हिरासत में ले लिया गया।

इसके बाद अब्दुल्लाह आज़म एक और लंबे दौर की कैद में रहे।

करीब 17 महीने जेल में रहने के बाद, 18 फरवरी 2025 को रामपुर की MP/MLA अदालत ने उन्हें एक अलग मामले में जमानत दी और 25 फरवरी 2025 को वह हरदोई जेल से बाहर आए।

और जब वह बाहर आए…

चेहरे पर मुस्कुराहट थी।

जिन्होंने जेल की लंबी दीवारें देखी हों, जिनकी जिंदगी मुकदमों के बीच गुजर रही हो, उनके चेहरे की वह मुस्कुराहट उनके समर्थकों के लिए हौसले और अपने पक्ष पर भरोसे की निशानी थी।

लोगों ने समझा होगा कि शायद इतने मुकदमे और इतनी जेल उनके हौसले को तोड़ देंगे।

लेकिन अब्दुल्लाह आज़म खान ने हार नहीं मानी।

फिर आया 17 नवंबर 2025

रामपुर की विशेष MP/MLA अदालत ने दो PAN कार्ड से जुड़े 2019 के मामले में अब्दुल्लाह आज़म खान और उनके वालिद मोहम्मद आज़म खान को सात-सात साल की सज़ा सुनाई। अदालत के फैसले के बाद दोनों को हिरासत में ले लिया गया।

यानी एक बार फिर—

बाप जेल में…बेटा जेल में…
और परिवार के सामने एक और लंबी कानूनी लड़ाई।

यही वह मुकाम है जहां राजनीति से जुड़े सबसे कठिन सवाल खड़े होते हैं।

क्या किसी राजनीतिक परिवार का सदस्य होने की वजह से उस पर होने वाली हर कानूनी कार्रवाई को शक की नजर से देखा जाना चाहिए?

नहीं।

लेकिन क्या किसी राजनीतिक परिवार के खिलाफ लगातार चल रहे मुकदमों पर सवाल पूछना भी गलत है?

बिल्कुल नहीं।

न्यायालय अपना फैसला कानून और साक्ष्यों के आधार पर करते हैं। लेकिन लोकतंत्र में जनता को यह पूछने का अधिकार है कि कानून का इस्तेमाल हर व्यक्ति के लिए समान रूप से हो रहा है या नहीं।

आज अब्दुल्लाह आज़म खान साहब के समर्थकों की लड़ाई सिर्फ एक सज़ा के खिलाफ नहीं है।

यह उस उम्मीद की लड़ाई है कि अपील का अधिकार कायम रहे,
न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष रहे, और अंतिम सत्य तथ्यों और कानून के आधार पर सामने आए।

क्योंकि जेल किसी इंसान की आज़ादी छीन सकती है—

लेकिन अगर हौसला जिंदा हो,
तो उसकी आवाज़ को कैद नहीं कर सकती।

22 और 17 महीने की कैद के बाद चेहरे की मुस्कुराहट हो,
या सात साल की सज़ा के बाद भी संघर्ष का हौसला—
अब्दुल्लाह आज़म खान की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।

फैसला अदालत का हो सकता है,
लेकिन इंसाफ की उम्मीद जनता के दिल में जिंदा रहती है।

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