16 बीघे में विराजमान हैं भमरौआ के ‘श्री पातालेश्वर महादेव’, 1822 में चौथी पीढ़ी के नवाब ने रखी थी बुनियाद
1788 में स्वयंभू प्रकटीकरण: शिवलिंग पर खुरपी-दरांती रगड़ने वालों के उड़ गए थे बाल, हटाने का प्रयास करने वाले तत्कालीन जमींदार का हुआ था विनाश
• मदारपुर के पंडित श्री दयाल दास जी को 1822 में सौंपी गई थी सेवा, आज 11वीं पीढ़ी के पुजारी पंडित नरेश कुमार शर्मा कर रहे हैं इस भव्य दरबार की देखभाल
रामपुर, श्रावण मास में शिवभक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना ‘श्री पातालेश्वर शिव मंदिर, भमरौआ’ अपने आप में प्राचीनता, चमत्कार और साम्प्रदायिक सौहार्द की एक जीती-जागती मिसाल है। भृगु संहिता के अनुसार यह स्वयंभू शिवलिंग महाभारत कालीन (लगभग 3000 वर्ष पुराना) है। 1788 में इसके चमत्कारों के प्रकटीकरण के बाद, 1822 में चौथी पीढ़ी के नवाब अहमद अली साहब ने न केवल मंदिर की बुनियाद रखी बल्कि 16 बीघे की पूरी संपत्ति भी मंदिर को दान कर दी। वर्तमान में प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन की ‘सावन मेला एवं कांवड़ यात्रा कार्ययोजना’ के तहत मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों का कायाकल्प किया गया है। डीएम, एसपी और सीओ स्तर के अधिकारी दिन-रात यहां की चाक-चौबंद व्यवस्थाओं की निगरानी कर रहे हैं, ताकि कांवड़ियों को कोई असुविधा न हो।
खुरपी-दरांती रगड़ने से गंजे हो गए थे लोग, जमींदार का हुआ नाश
मंदिर के वर्तमान पुजारी पंडित नरेश कुमार शर्मा बताते हैं कि यहां किसी शिवलिंग की स्थापना नहीं की गई, बल्कि भोलेनाथ की यह प्रतिमा स्वयंभू है। 1788 में जब यह शिवलिंग जाग्रत अवस्था में आया, तो लोगों ने अनजाने में इसे पत्थर समझकर अपनी दरांती और खुरपी की धार तेज करनी शुरू कर दी। चमत्कार स्वरूप जिन लोगों ने भी ऐसा किया, उनके सिर में भयंकर खुजलाहट हुई और हाथ रखते ही सारे बाल झड़ गए। देखते ही देखते गंजों की भरमार लग गई। जब तत्कालीन जमींदार ने इस शिवलिंग को हटाने का प्रयास किया, तो बताते हैं कि वह और उसका पूरा परिवार नष्ट हो गया। इन घटनाओं ने सिद्ध कर दिया कि ‘प्रत्यक्षं किं प्रमाणम्’ (प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं)।

नवाब का दान और 11 पीढ़ियों का निरंतर समर्पण
चमत्कारों की खबर सुनकर 1822 में नवाब अहमद अली साहब (चौथी पीढ़ी के नवाब) यहां आए। उन्होंने सारी प्रॉपर्टी मंदिर के नाम कर दी। पूजा-पाठ का जिम्मा यहां से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम मदारपुर के निवासी पंडित श्री दयाल दास जी को सौंपा गया। आज 11वीं पीढ़ी के रूप में पंडित नरेश कुमार शर्मा इस दरबार की सेवा कर रहे हैं। उनके 10 पूर्वज मंदिर की सेवा करते हुए स्वर्गवासी हो चुके हैं।
भृगु संहिता का रहस्य और कोसी नदी का बदलता प्रवाह
मंदिर के प्राचीन इतिहास को लेकर एक संत ने भृगु संहिता के आधार पर हैरान करने वाली जानकारी दी थी। संसार के सबसे बड़े ज्योतिष ग्रंथ के अनुसार यह शिवलिंग महाभारत कालीन है और संत ने अपने पूर्व जन्म (करीब 3000 वर्ष पूर्व) में यहां तपस्या की थी। उस समय की भौगोलिक स्थिति के अनुसार, जो कोसी नदी आज पश्चिम में बह रही है, वह उस काल में शिवलिंग के पूरब में बहा करती थी।
सरकारी ‘कार्ययोजना’ के तहत कायाकल्प और पीएसी तैनात
प्रशासन की ‘सावन मेला कार्ययोजना’ के तहत भमरौआ मंदिर क्षेत्र में व्यापक तैयारियां की गई हैं। जर्जर हो चुकी सड़कों को पूरी तरह नया बना दिया गया है और बेहतरीन लाइटिंग की व्यवस्था की गई है। हालांकि यहां कभी कोई साम्प्रदायिक तनाव नहीं रहा, लेकिन एहतियातन पूरे महीने के लिए पीएसी की एक पूरी बटालियन मुस्तैद की गई है। डीएम और एसपी के साथ-साथ सीओ स्तर के अधिकारी रात में भी आकर निरीक्षण कर रहे हैं।
बिना चंदे का विशाल निर्माण, 51 किलो से ढाई कुंतल तक का चढ़ावा
16 बीघे के विशाल परिसर में बन रहे भव्य दरबार के लिए कभी किसी से चंदा नहीं मांगा जाता। जिनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, वे भक्त अपनी श्रद्धा से दान करते हैं। सावन में कांवड़ियों के लिए दिन-रात बेलिमिट भंडारे चल रहे हैं। 90% भंडारे मनोकामना पूर्ण होने वाले भक्त ही कराते हैं। श्रद्धालु अपनी शक्ति के अनुसार 51 किलो, सवा कुंतल या ढाई कुंतल तक की रसद लाते हैं और शिवभक्तों की सेवा करते हैं, जो भगवान की असीम कृपा और शक्ति का सबसे बड़ा प्रत्यक्ष प्रमाण है।
