विकास की कीमत कहीं हमारा भविष्य तो नहीं?

  • रिपोर्ट: मनोज यादव

एटा: विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास जो आने वाली पीढ़ियों की साँसें छीन ले, वह प्रगति नहीं बल्कि विनाश की प्रस्तावना है। आज चौड़ी सड़कों, ऊँची इमारतों और औद्योगिक परियोजनाओं के नाम पर लाखों पेड़ों की बलि दी जा रही है। प्रश्न यह है कि यदि हरियाली ही समाप्त हो जाए, तो इस विकास का लाभ किसे मिलेगा?

हर वर्ष वृक्षारोपण अभियानों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। कागज़ों में लाखों पौधे लगाने के दावे होते हैं, फोटो खिंचते हैं, रिपोर्टें बनती हैं, लेकिन धरातल पर सच्चाई अक्सर सूखी मिट्टी और मरे हुए पौधों के रूप में दिखाई देती है। जनपद एटा में राष्ट्रीय राजमार्ग-34 के निर्माण के दौरान सड़क किनारे हजारों-लाखों पेड़ काटे गए। वर्षों बीत जाने के बाद भी हाईवे के किनारे छाया देने वाले वृक्ष दिखाई नहीं देते। तपती धूप में यात्री छाया के लिए तरसते हैं और जिम्मेदार तंत्र मानो आँख, कान और जुबान तीनों बंद किए बैठा है।

सिर्फ पौधे लगाना पर्याप्त नहीं है; उन्हें वृक्ष बनने तक जीवित रखना असली जिम्मेदारी है। नियमित सिंचाई, सुरक्षा, निगरानी और सामाजिक भागीदारी के बिना वृक्षारोपण केवल सरकारी आँकड़ा बनकर रह जाता है। वृक्षारोपण के दावों का स्वतंत्र सामाजिक एवं प्रशासनिक सत्यापन हो तो धरातल पर पौधों की जीवित संख्या 10% या उससे भी कम होगी।

आज यदि हमने जंगलों, नदियों और हरियाली को बचाने के लिए गंभीर कदम नहीं उठाए, तो कल बढ़ती गर्मी, जल संकट और जहरीली हवा हमारे बच्चों की सबसे बड़ी विरासत बन जाएगी। सच्ची प्रगति वही है जहाँ विकास की सड़कें भी बनें और उनके किनारे पेड़ों की छाया भी बची रहे। क्योंकि विकास और पर्यावरण का संतुलन ही सुरक्षित भविष्य की असली पहचान है।

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