सत्ता का अहंकार या राजनीतिक संस्कार?

गुस्ताखी माफ़ हरियाणा: पवन कुमार बंसल

इनेलो विधायक अर्जुन चौटाला का रोहतक में अधिकारियों के प्रति व्यवहार एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। पार्टी का ज्ञापन लेने में हुई देरी से नाराज़ विधायक ने जिला उपायुक्त (डीसी) को कथित तौर पर यह कहते हुए चेतावनी दी कि “हम भूलते नहीं हैं, सत्ता में आकर देखेंगे।” वहीं पुलिस अधीक्षक (एसपी) से भी तीखे शब्दों में बात करते हुए “जा, दफ़ा हो जा” जैसी टिप्पणी कर दी।

यह घटना केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के रिश्तों पर भी सवाल खड़े करती है। लोकतंत्र में असहमति और नाराज़गी स्वाभाविक है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में भाषा और मर्यादा का भी अपना महत्व होता है।

मैं उसे कब्र में से भी निकाल लेता हूँ 

चौटाला परिवार और अधिकारियों के बीच टकराव के किस्से पहले भी सुर्खियों में रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला ने एक बार रोहतक में तत्कालीन एसपी के बारे में कहा था कि “मैं उसे कब्र में से भी निकाल लेता हूँ।” विडंबना यह रही कि बाद में उसी अधिकारी के बेटे ने शिक्षक भर्ती घोटाले के मामले में ओम प्रकाश चौटाला को दस वर्ष की सजा सुनाई।

 वारंट फाड़ अधिकारी को मारा थप्पड़

पूर्व उपप्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल भी एक पुराना किस्सा सुनाया करते थे। उनके अनुसार, सिरसा में एक जनसभा के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल ने उनके गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए थे। जब डीएसपी सत्यदेव सिंह उन्हें गिरफ्तार करने पहुंचे तो उन्होंने कथित तौर पर वारंट फाड़ दिया और अधिकारी को थप्पड़ मार दिया। उस दौर की राजनीति में ऐसे प्रसंग अक्सर ताकत और प्रभाव के प्रतीक के रूप में सुनाए जाते थे।

हालांकि, चौटाला परिवार में इसका दूसरा पक्ष भी देखने को मिलता है। सुनयना चौटाला को प्रशासनिक अधिकारियों से बेहद शालीनता और सम्मानपूर्वक व्यवहार करने वाली नेता माना जाता है। यही वजह है कि अधिकारी भी उनके प्रति सम्मान का भाव रखते हैं।

राजनीति में ताकत और प्रभाव का प्रदर्शन नया नहीं है, लेकिन समय बदल चुका है। आज जनता नेताओं को केवल उनके संघर्ष या विरासत से नहीं, बल्कि उनके आचरण और संवाद की शैली से भी आंकती है। लोकतंत्र में पद बड़ा हो सकता है, लेकिन मर्यादा उससे भी बड़ी होती है।

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