चोली की पीछे क्या हैं- शराब की बॉटल पर क्या है – हरियाणा में शराब माफिया -हमारी जाँच पड़ताल… हमाम में सब नंगें है, बंद कमरों में पर्दों के पीछे!

गुस्ताख़ी माफ हरियाणा – पवन कुमार बंसल

चोली के पीछे क्या हैं – शराब की बोतल पर क्या हैं ? हमारी जाँच – भाग एक i हरियाणा में शराब माफिया ने काफ़ी समय तक ठेको कीं बोलीं नही होने दी और जब हुई तो सरकार को अरबों का चूना लगाi खेर अब पालिसी बन गयीं हैं और इसे फूलप्रूफ़ बनाने की लिए सरकार के पास काफ़ी समय है

हमने विस्तृत खोज की तो नतीजा निकला की यह तो मुम्बइया थ्रिलर मूवीं का मसाला है iआबकारी विभाग का मंत्रालय कभी किसी छोटे मोटे नेता के पास रहा ही नहीं जो सौ करोड़ से कम का मानहानि दावा ठोके । और कलम के सिपाही की औक़ात दो कप चाय से अधिक की कभी रहती नहीं । उन दो कप में से भी एक कप तो वो ख़ुद ही पीता है । सो भावनाओं को काबू में रख कर हल्के हल्के सुरूर के साथ ही लिखना होगा , नशे का झटका देने वाला लेख लेखक के बर्तन बिकवा सकता है ।फिर भी , जो जान की बाज़ी न लगा दे , वो सिपाही क्या ?चाहे वो कलम का सिपाही ही क्यों न हो ?ऐसा नहीं है कि हरियाणा में कभी इस बारे में कभी सोचा ही नहीं गया या कहिए कि प्रयास ही नहीं हुआ । प्रयास हुआ , लेकिन उस प्रयास के बाद बंद कमरो में पर्दों के पीछे जो घटनायें घटीं, उनका ज़िक्र भी कर दिया जाये तो ज़िक्र करने वाले पर सौ करोड़ का मानहानि का दावा ठोका जाना तय है ।लेकिन यक्ष प्रश्न दशकों से लेकर आज तक यूँ ही खड़ा है कि हरियाणा में शराब की बॉटल से प्राइस टैग ग़ायब क्यों है , जबकि पड़ोस के राज्य उत्तर प्रदेश में पूरा मूल्य पहले से लिखा होता है । कोई असमंजस नहीं ।किसी फ़िल्म का एक जोक था जिसमे विलेन हीरोइन से कहता है , हमारे होते हुए आपकी इज़्ज़त को और किसी से कोई ख़तरा नहीं ।

शराब कारोबारियों के साथ कई दशकों पहले कुछ ऐसा ही वाक़या हुआ था । जब प्रदेश के मुख्यमंत्री ने सारे प्रदेश का शराब कारोबार एक ही ठेकेदार व्यवसायी के हाथों में सौंप दिया था और स्पष्ट निर्देश दे दिया था कि कोई भी पुलिस वाला , आबकारी विभाग का इंस्पेक्टर या कोई भी सरकारी विभाग का मुलाजिम अगर आपके किसी भी ठेके पर कभी भी कुछ ‘माँगने’ आ जाये तो सीधे मुख्यमंत्री साहब से बात करा देना । उनके होते हुए कोई भी किसी भी ठेके से कुछ ले नहीं सकता । किसी पुलिस वाले को अपने लिये ही कभी अद्धा या बोतल लेनी होती तो बेचारा पहले यूनिफार्म बदल कर आता और पैसे देकर ही ख़रीदी करता ।कोई पहचान लेता तो शर्म लिहाज़ से थोड़ी सस्ती ज़रूर लगा देता ।आपने अपने प्रदेश में जो बोतल ख़रीदी , आपको क्या पता उसमे से लोकल थानेदार का खर्चा , बिजली का जो कनेक्शन ठेके पर लगा है , तो बिजली विभाग का खर्चा , ठेकों पर जो कारिंदे काम पर लगाये हैं , उनके कारण , लेबर विभाग का खर्चा , उनकी तनख़्वाह से कोई प्रोविडेंट फण्ड काटना पड़े तो प्रोविडेंट फण्ड विभाग का खर्चा , आमदनी कितनी हुई कितनी नहीं हुई ये बताने में आयकर विभाग का खर्चा , शराब पर लगने वाले वैट का खर्चा , एक्साइज़ ड्यूटी का खर्चा और न जाने कितने तरह के खर्चे कहीं जुड़ते हैं कहीं नहीं भी जुड़ते , अब ये सब जोड़ घटा करके ही तो बेचारा ठेकेदार बताता है कि एक बॉटल कितने की पड़ी ?एक शराब की बॉटल पर प्राइस टैग आते आते बहुत सी राजनीति अपना खेल खेल जाती है । कई माफिया और तस्कर अपना रंग जमा चुके होते हैं।आबकारी विभाग अपनी उठा पटक कर चुका होता है । तब कहीं जाकर ये ये नतीजा निकलता है कि बॉटल पर कोई मूल्य लिखा ही न जाये । जिसको जितना ठीक लगे उतने की बेचो । बस सरकार एक लिस्ट दे देती है , उस से कम पर ना बेचो ।हरियाणा में शराब की बॉटल से प्राइस टैग नदारद क्यों रहता है ?*ऐसा क्यों है कि शराब की बॉटल अगर केवल उत्तर प्रदेश में ही बिक्री के लिए है , तो उस पर अधिकतम मूल्य भी लिखा होगा लेकिन अगर वो हरियाणा में बिक्री के लिये है , तो उस पर कहीं कोई मूल्य नहीं लिखा मिलेगा ?*जनवरी 2018 , आबकारी विभाग हरियाणा ने विचार किया कि अबकी बार ऐसा काम कर जाएँगे कि अगली सरकार 2019 में जो भी बनाये वो नयी स्कीम को देखता रह जाये । वो विचार था आबकारी विभाग में कॉर्पोरेशन बनाने का । जिसे ठेकेदार नहीं , सरकार ख़ुद चलायेगी । कमेटियां बनीं, सदस्य बने । विचार चले । फिर पर्दे के पीछे बंद कमरों में कुछ मंत्रियों के बीच इस मुद्दे पर इतनी तू तड़ाक हुई कि ये मुद्दा जहाँ था वहीं रोकना पड़ा । और इतना जल्दबाज़ी में इतना बड़ा नीतिगत फ़ैसला लेना और लागू करना आसान भी नहीं था । मंत्रिमंडल के फ़ैसले से कोई मंत्री निजी तौर पर ख़ुश हो या ना हो , फ़ैसला पूरे मंत्रिमंडल का ही माना जाता है । और कुछ अन्य विभागों के मंत्रियों को ये निर्णय बिल्कुल भी पसंद नहीं आया था । इतना नापसंद कि उसे तू तड़ाक की उपमा दी जा सकती है अगर मानहानि केस होने का डर ना हो तो । खैर जब नाम ही नहीं लिया किसी का तो अपनी दाढ़ी का तिनका दिखा कर केस भी कौन ही करेगा ।आज या कई सालों से शराब के बड़े ठेकेदार को शराब की कंपनी अपनी शराब ज़्यादा से ज़्यादा खपाने के लिये अंदरूनी तौर पर भारी छूट देती है । वो चाहे उधारी के रूप में हो चाहे कैश डिस्काउंट के रूप में । इस छूट में से वो शराब का ठेकेदार किसी भी सरकार में अपनी पैठ बना कर किसी भी तरह के काम निकलवा सकता है । लेकिन अगर कारोबार आबकारी अधिकारी करने लगेंगे , तो कंपनी की वो छूट का लाभ कहाँ जायेगा?

कोई मंत्री अगर अपने अधिकारियों से कह दे कि फ़लाँ कंपनी की शराब की ख़रीद पर ब्रेक लगा दो और फ़लाँ कंपनी की शराब पर एक्सिलेटर दबा दो , तो बाक़ी मंत्रालय के मंत्री कहेंगे असली मंत्री तो ये ही हैं , हम तो बस …..। यही झगड़ा था । जारी i

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