रामलीला कलाकारों द्वारा सीता हरण दृश्य की शानदार प्रस्तुति, वधवा परिवार ने की बाबा रामदेव जी की आरती से झूमे दर्शक
ऐलनाबाद, 30 सितंबर ( एम पी भार्गव ) शहर के श्री गौशाला मार्ग पर श्री रामलीला कमेटी के बैनर तले वृंदावन से आये कलाकारों की भव्य श्रीरामलीला सातवें दिन भी जारी रही। मध्यरात्रि तक चली श्री रामलीला को देखने सैंकडो महिला पुरुष दर्शक पहुंच रहे है। सातवें दिन की श्रीरामलीला के प्रारंभ में स्थानीय वधवा बस सर्विस के मालिक व समाजसेवी राजीव वधवा ने अपने परिवारजनों के साथ बाबा रामदेव व पवित्र रामायण की आरती की। श्रीरामलीला के प्रारंभ में घने जंगलों में श्रीराम, जानकी और लक्ष्मण एक कुटिया बनाकर रह रहे है। इसी दौरान लंकापति रावण की बहन शूर्पणखा एक सुंदर कन्या के वेष में वहां पहुंचती है। वह श्रीराम और लक्ष्मण के पास बारी बारी अपनी शादी का प्रस्ताव लेकर जाती है। लेकिन श्रीराम और लक्ष्मण दोनो ने उसके शादी के प्रस्ताव को ठुकरा देते है। जिस पर क्रोधित होकर शूर्पणखा अपने असली राक्षसी के रूप में आकर जानकी पर हमला करने की कोशिश करती है। तब लक्ष्मण शूर्पणखा को अपने पास बुलाकर उसकी नाक काट देते है। जिससे लहूलुहान शूर्पणखा चीखती चिल्लाती हुई अपने भाइयों खर और दूषण नामक राक्षसों के पास जाती है और उन्हें श्रीराम-लक्ष्मण के प्रति भड़का देती है। जिससे गुस्से में तिलमिलाए दोनो राक्षस बन्धु अपने अन्य साथियों को लेकर श्रीराम-लक्ष्मण पर हमला बोल देते है। इस युद्ध मे श्रीराम अपने एक ही बाण से सभी राक्षसों का अंत कर देते है। अब शूर्पणखा यहां से लंकापति रावण के दरबार मे पहुंचकर उन्हें कहर-दूषण के अंत की सारी कहानी सुनाती है और अपनी दुर्दशा के लिए श्रीराम-लक्ष्मण को जिम्मेदार ठहराती है। जिस पर लंकापति रावण समझ जाता है कि खर और दूषण जैसे योद्धाओं का संहार करने वाला कोई साधारण व्यक्ति नही बल्कि स्वयं नारायण ने इस धरती पर अवतार ले लिया है। लंकापति रावण श्रीराम लक्ष्मण से सीधे युद्ध करने की बजाय एक तरकीब सोचता है। वह अपने मामा मारीच की सहायता लेने जाता है। लंकापति रावण जब मारीच को श्रीराम-लक्ष्मण के बारे में बताता हैं तो मारीच उन दोनो का नाम सुनकर ही रावण की सहायता करने से साफ मना कर देता है। लेकिन रावण के धमकाने पर थोड़ी ना-नुकुर के बाद वह रावण की सहायता करने के लिए तैयार हो जाता है। रावण आने मामा मारीच को एक स्वर्ण मृग बनाकर वन में भेजता है। जानकी जब उस स्वर्ण मृग को देखती है तो श्रीराम को वह स्वर्ण मृग को लाकर देने की जिद करती है।
जिस पर श्रीराम लक्ष्मण को जानकी की रक्षा में खड़ा रहने का कहकर स्वयं उस स्वर्ण मृग के पीछे घने जंगल मे चले जाते है। थोड़ी देर में जानकी व लक्ष्मण को श्रीराम के चित्कार की आवाज़ सुनाई देती है जिससे घबराकर जानकी वहां मौजूद लक्ष्मण को शीघ्रतिशीघ्र अपने बड़े भाई श्रीराम की सहायता के लिए जाने को कहती है लेकिन लक्ष्मण माता जानकी की सुरक्षा के चलते वहां से जाने से इंकार कर देते है। लेकिन जानकी के बार बार कहने पर वे श्रीराम की सहायता के लिए वनों की ओर चले जाते है लेकिन जाने से पहले वे जानकी को कुटिया के भीतर भेजकर कुटिया के बाहर लक्ष्मण रेखा लगा देते है। वे जानकी को इस लक्ष्मण रेखा को पार नही करने की चेतावनी भी दे जाते है। लक्ष्मण के जाते ही लंकापति रावण साधु वेष बनाकर जानकी के पास भिक्षा मांगने आता है। जब जानकी कुटिया के भीतर से ही साधु को भिक्षा देने लगती है लेकिन रावण बंधी हुई भिक्षा लेने से इंकार कर देता है। वह बार-बार जानकी को कुटिया के बाहर आकर भिक्षा देने को कहता है। जैसे ही जानकी कुटिया से बाहर आती है तो साधु बना हुआ लंकापति रावण अपने असली रूप में आ जाता है। वह जबरदस्ती करते हुए रोती बिलखती और विलाप करती जानकी को चुराकर अपने साथ ले जाता है। इधर जब श्रीराम और लक्ष्मण वापस कुटिया में लौटते है तो जानकी को वहां नही पाकर बहुत दुःखी हो जाते है। दोनो भाई जानकी की तलाश में वन-वन भटकने लगते है। श्रीरामलीला के कलाकारों के इस भावपूर्ण दृश्य पर माहौल नम हो जाता है। दर्शकों ने तालियां बजाकर वृंदावन से आये श्री रामलीला के कलाकारों के अभिनय को खूब सराहा। इस अवसर पर श्रीरामलीला कमेटी के उपाध्यक्ष ओपी पारीक व राधाकृष्ण पटीर, कोषाध्यक्ष व सचिव राजेश वर्मा, सह सचिव प्रवीण फुटेला, प्रेस प्रवक्ता सुभाष चौहान, कला मंच के डायरेक्टर अशोक जसरासरिया, सुल्तान शर्मा, देवेंद्र गोयल, त्रिलोक जोशी, मुरारी जसरासरिया, मुकेश ग्रोवर, साहिल प्रजापति, श्यामसुंदर परिहार, धर्मवीर धोकरवाल, सोनू बत्तरा, मनीष मक्कड़, अंकित जिंदल, नवशेर मान, बसंत सरिया, टीकम चोटिया, हवलदार, मक्खन व चांद माही सहित अन्य कई गणमान्यजन भी उपस्थित थे।
