लखनऊ : उत्तर प्रदेश की राजनीति देश की सियासत की दिशा तय करने में हमेशा अहम रही है। आजादी के बाद प्रदेश में पहला विधानसभा चुनाव 1951-52 में हुआ। उस समय कांग्रेस का मजबूत प्रभाव था और गोविंद बल्लभ पंत ने मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश की कमान संभाली। इसके बाद कई दशकों तक कांग्रेस उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में रही। हालांकि, समय के साथ नए राजनीतिक दलों और सामाजिक समीकरणों के उभार ने प्रदेश की सियासत की तस्वीर बदल दी।
कांग्रेस के दबदबे से गैर-कांग्रेसी राजनीति तक
1957 और 1962 के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस का प्रभाव कायम रहा। लेकिन 1967 का विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा मोड़ साबित हुआ। कांग्रेस बहुमत से दूर हो गई और चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।
इसके बाद उत्तर प्रदेश में गठबंधन, दल-बदल और सत्ता परिवर्तन का दौर शुरू हुआ। 1967 के बाद कुछ ही वर्षों में कई मुख्यमंत्री बदले और प्रदेश की राजनीति में अस्थिरता भी देखने को मिली।
1977 में बदली सत्ता की तस्वीर
आपातकाल के बाद 1977 के विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी को बड़ी सफलता मिली और राम नरेश यादव मुख्यमंत्री बने। इसके बाद 1980 में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की।
इस दौर में वीपी सिंह, श्रीपति मिश्र, नारायण दत्त तिवारी और वीर बहादुर सिंह जैसे नेता मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे। 1980 का दशक खत्म होते-होते उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का पुराना वर्चस्व कमजोर होने लगा और समाजवादी तथा अन्य क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों के लिए जमीन तैयार होने लगी।
1989 के बाद समाजवादी और मंडल राजनीति का दौर
1989 का विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक और निर्णायक मोड़ लेकर आया। मुलायम सिंह यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने। इसके बाद 1991 में BJP ने बड़ी जीत दर्ज की और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने।
1993 में SP-BSP गठबंधन के बाद मुलायम सिंह यादव फिर मुख्यमंत्री बने। इसी दशक में मायावती का राजनीतिक उभार हुआ और वह पहली बार 1995 में मुख्यमंत्री बनीं। इसके बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में BJP, SP और BSP तीन प्रमुख राजनीतिक शक्तियों के रूप में उभरीं।
मायावती और अखिलेश यादव के दौर ने बदली तस्वीर
2007 का विधानसभा चुनाव मायावती और BSP के लिए ऐतिहासिक रहा। BSP ने पूर्ण बहुमत हासिल किया और मायावती ने पूरे पांच साल सरकार चलाई।
इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को बहुमत मिला और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने। मायावती ने दलित राजनीति के साथ अलग-अलग सामाजिक समूहों को जोड़कर BSP का मजबूत आधार तैयार किया, जबकि अखिलेश यादव ने युवा नेतृत्व के साथ समाजवादी पार्टी को नई राजनीतिक पहचान देने की कोशिश की।
इस तरह दोनों नेताओं के दौर ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में BSP और SP की महत्वपूर्ण भूमिका को और मजबूत किया।
2017 में BJP की प्रचंड वापसी
2017 का विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश की राजनीति का बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। BJP ने भारी बहुमत हासिल किया और योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया।
पांच साल बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में BJP ने एक बार फिर बहुमत हासिल किया और योगी आदित्यनाथ दोबारा मुख्यमंत्री बने। इस जीत के साथ BJP ने उत्तर प्रदेश में अपनी मजबूत राजनीतिक स्थिति बरकरार रखी।
पंत से योगी तक, बदलता रहा मुख्यमंत्री का चेहरा
1951-52 से 2022 तक उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई बड़े नेताओं ने मुख्यमंत्री पद संभाला। इनमें गोविंद बल्लभ पंत, सम्पूर्णानंद, चंद्रभानु गुप्त, सुचेता कृपलानी, चौधरी चरण सिंह, हेमवती नंदन बहुगुणा, नारायण दत्त तिवारी, मुलायम सिंह यादव, कल्याण सिंह, मायावती, राजनाथ सिंह, अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ समेत कई नेता शामिल रहे।
सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, जबकि मायावती ने चार अलग-अलग कार्यकाल में प्रदेश की कमान संभाली।
कांग्रेस से क्षेत्रीय दलों और फिर BJP तक पहुंची सियासत
1951-52 से 2022 तक का चुनावी सफर बताता है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति कांग्रेस के लंबे वर्चस्व से निकलकर गठबंधन, मंडल-कमंडल की राजनीति, क्षेत्रीय दलों के उभार और फिर BJP के मजबूत प्रभुत्व तक पहुंची।
चुनाव दर चुनाव सामाजिक समीकरण, नेतृत्व और राजनीतिक मुद्दे बदलते रहे। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव केवल राज्य की सत्ता तय करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका प्रभाव अक्सर राष्ट्रीय राजनीति की दिशा पर भी दिखाई देता रहा है।
