नई दिल्ली: लोन लेने वाले ग्राहकों के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ब्याज दरों को लेकर नया प्रस्ताव रखा है। केंद्रीय बैंक ने सभी Regulated Entities (REs) के लिए लोन की ब्याज दर तय करने से जुड़े नियमों को अधिक समान और पारदर्शी बनाने के लिए ड्राफ्ट फ्रेमवर्क पेश किया है। इसका उद्देश्य ग्राहकों को यह समझने में आसानी देना है कि उनके लोन की ब्याज दर किस आधार पर तय होती है और उसमें बदलाव कैसे होता है।
क्या है RBI का नया प्रस्ताव?
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत सभी लोन को एक Benchmark Rate और एक निर्धारित Spread से जोड़ने की बात कही गई है। यह स्प्रेड संबंधित बैंक या NBFC की बोर्ड-अप्रूव्ड और पारदर्शी आंतरिक नीति के आधार पर तय होगा।
प्रस्ताव के अनुसार लोन की कीमत संबंधित बेंचमार्क रेट से कम नहीं रखी जा सकेगी। Jefferies के अनुसार, कुछ NBFCs फिलहाल PLR से कम दर पर लोन देते हैं। ऐसे मामलों में उन्हें नए फ्रेमवर्क के अनुरूप अपना बेंचमार्क बदलना पड़ सकता है।
Floating Rate Loan में क्या बदलाव होगा?
RBI ने बैंकों के Floating Rate Personal और MSME Loans के लिए External Benchmark से लिंकिंग को बनाए रखने का प्रस्ताव रखा है। साथ ही MCLR (Marginal Cost of Funds Based Lending Rate) की गणना को भी एक समान करने की बात कही गई है।
प्रस्ताव में MCLR की गणना नए डिपॉजिट और बॉरोइंग की मासिक Marginal Cost के 3-महीने के Moving Average के आधार पर करने की बात है। इसके अलावा Floating Rate Loan की ब्याज दर का Reset Period अधिकतम 3 महीने रखने का प्रस्ताव है।
ब्याज की गणना का तरीका भी होगा समान
RBI ने ब्याज की गणना को लेकर भी एक समान व्यवस्था प्रस्तावित की है। इसके तहत:
- ब्याज Daily Reducing Balance के आधार पर निकाला जाएगा।
- Actual/Actual Day-Count Convention लागू करने का प्रस्ताव है।
- ब्याज में Monthly Rest का इस्तेमाल होगा।
- WCDL सुविधाओं में Fixed-Tenure Drawdown को ब्याज दर और स्प्रेड तय करने के लिए अलग लोन माना जा सकता है।
Jefferies के मुताबिक Actual/Actual Day-Count Convention लागू करने में शुरुआत में कुछ ऑपरेशनल चुनौतियां आ सकती हैं।
ग्राहकों पर क्या असर पड़ेगा?
RBI के प्रस्ताव का प्रमुख उद्देश्य लोन की ब्याज दर तय करने की प्रक्रिया में Transparency और Borrower Protection बढ़ाना है। Citi के मुताबिक, Consolidated Interest Rates Directions Framework पारदर्शिता, कर्जदारों की सुरक्षा और Rate Governance को मजबूत करने की दिशा में कदम है।
इसका मतलब यह है कि ग्राहक को लोन लेते समय ब्याज दर के पीछे मौजूद बेंचमार्क और स्प्रेड की जानकारी अधिक स्पष्ट तरीके से मिल सकेगी।
Spread Revision के लिए भी प्रस्ताव
प्रस्ताव में Non-CRP Spread Components को तीन साल तक लॉक रखने की बात कही गई है। वहीं CRP (Credit Risk Premium) में बदलाव ग्राहक की Credit Profile में बदलाव होने पर किया जा सकेगा।
इससे ब्याज दर में बदलाव के नियम पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट होने की उम्मीद है।
छोटे लोन पर APR Cap का प्रस्ताव
RBI ने ₹50,000 तक के Microfinance और Small-Value Retail Loans के लिए Annual Percentage Rate यानी APR की अधिकतम सीमा तय करने का प्रस्ताव भी रखा है।
इसका उद्देश्य छोटे कर्ज लेने वाले ग्राहकों के लिए ब्याज और लोन की वास्तविक लागत को नियंत्रित करने में मदद करना है। हालांकि, इससे ऐसे छोटे लोन देने वाले कुछ lenders की कमाई पर दबाव पड़ सकता है।
Lenders के लिए बढ़ सकती है Compliance Cost
नए नियमों से ग्राहकों के लिए पारदर्शिता बढ़ सकती है, लेकिन बैंकों और NBFCs के लिए शुरुआत में Compliance Cost और Operational Complexity बढ़ने की संभावना भी है।
प्रस्ताव में lenders को तैयारी के लिए समय देने की बात कही गई है और 29 अप्रैल की Transition Deadline का उल्लेख किया गया है।
ध्यान रखें, अभी यह प्रस्ताव है
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये RBI के प्रस्तावित नियम हैं। इन्हें अंतिम नियम समझना सही नहीं होगा। अंतिम व्यवस्था RBI की प्रक्रिया पूरी होने के बाद स्पष्ट होगी।
अगर ये बदलाव लागू होते हैं, तो Floating Rate Loan लेने वाले ग्राहकों के लिए ब्याज दर के Reset, Benchmark और Spread को समझना पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगा।
