गुस्ताखी माफ हरियाणा — पवन कुमार बंसल
आज विश्व प्रेस दिवस है।
कहते हैं दुनिया में सात अजूबे हैं, पर एक आठवां अजूबा भी है..और वो है हरियाणा का प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया।
अजूबा इसलिए नहीं कि ये ताकतवर है, अजूबा इसलिए कि सब कुछ जानते हुए भी जनता आज भी इस भ्रम में जी रही है कि मीडिया उनके मुद्दे उठाएगा, या प्रदेश के असली हालत बताएगा।
सच्चाई सीधी है —मीडिया को चाहिए विज्ञापन, और सरकार के पास है मोटा बजट।
ऊपर से हाल ये कि अस्सी फ़ीसदी मीडिया पर नेताओं का कब्ज़ा है।
नाम सब जानते हैं, कागज भी उनके, चैनल भी उनके, और खबरें भी… अपने हिसाब की।
कहीं अख़बार के नाम पर ज़मीन के खेल, कहीं बिल्डिंग किराए पर, कहीं परिवार का अख़बार, कहीं नेता का चैनल।
और इधर एक आम कलम घसीट — जो सच लिखना चाहता है, वो पाठकों के भरोसे खड़ा है।
सोच रहे हैं गुरुग्राम से एक साप्ताहिक अख़बार निकालें।
ना कोई बड़ा बजट, ना कोई राजनीतिक सहारा —
बस आप जैसे पाठकों का साथ।
क्योंकि असली ताकत ना सत्ता है, ना पैसा —
ताकत है पाठक।
अगर कलम की स्याही में ईमानदारी हो, और पेशे के प्रति निष्ठा हो, तो वो मिसाइल से भी ज्यादा ताकतवर होती है।
वरना…
पत्रकार और दलाल में फर्क ही क्या रह जाता है?
(गुस्ताखी माफ 🙏)
—
दुमछल्लाi
कुछ दिन पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी मेरे गुरुग्राम निवास पर मेरी बीमार माताजी का हाल पूछने आए।
उन्होंने “गुस्ताखी माफ हरियाणा” के लिए सरकारी विज्ञापन देने की पेशकश की।
मैंने उनका आभार जताया, पर साफ कहा —ये मंच मुनाफे के लिए नहीं है।
इसका खर्चा आज भी पाठक ही उठाते हैं…
और आगे भी वही इसकी असली ताकत रहेंगे।
