India Quick Commerce: 10 मिनट की डिलीवरी से आगे बढ़ा मुकाबला, अब मुनाफे और टिकाऊ बिजनेस मॉडल की जंग

India Quick Commerce: भारत का क्विक-कॉमर्स सेक्टर तेजी से एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। कुछ साल पहले तक इस इंडस्ट्री में सबसे बड़ा मुकाबला ग्राहकों तक सामान कम से कम समय में पहुंचाने, ज्यादा डार्क स्टोर खोलने और ऑर्डर की संख्या बढ़ाने को लेकर था। अब तस्वीर बदल रही है। कंपनियों के लिए सिर्फ तेजी से विस्तार करना पर्याप्त नहीं रह गया है, बल्कि कारोबार को मुनाफे में लाना और लंबे समय तक टिकाऊ बनाना बड़ी चुनौती बन गई है।

क्विक कॉमर्स में Blinkit, Instamart और Zepto जैसे प्रमुख खिलाड़ियों के साथ Amazon Now और Flipkart Minutes जैसी बड़ी कंपनियां भी अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं। ऐसे में आने वाले समय में बाजार में प्रतिस्पर्धा और तेज होने की संभावना है। वहीं निवेशकों का फोकस भी अब केवल बिक्री और ऑर्डर की संख्या पर नहीं, बल्कि हर ऑर्डर से होने वाली कमाई और लागत पर बढ़ता जा रहा है।

Blinkit ने मुनाफे के मामले में बनाई बढ़त

क्विक कॉमर्स सेक्टर में फिलहाल Blinkit ने मुनाफे के मामले में महत्वपूर्ण बढ़त हासिल की है। वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही तक Blinkit प्रमुख खिलाड़ियों में EBITDA पॉजिटिव होने वाली पहली कंपनी रही। इसका एडजस्टेड EBITDA मार्जिन 0.6 फीसदी रहा और प्रति ऑर्डर EBITDA करीब 3 रुपये बताया गया।

इसके मुकाबले Instamart और Zepto अभी भी प्रति ऑर्डर नुकसान के दौर में हैं। Instamart का प्रति ऑर्डर नुकसान करीब 68 रुपये और Zepto का करीब 60 रुपये बताया गया। हालांकि Instamart की यूनिट इकनॉमिक्स में सुधार हुआ है और पिछले एक साल में प्रति ऑर्डर एडजस्टेड EBITDA में भी सुधार दर्ज किया गया है।

इससे साफ है कि अब इस सेक्टर में सिर्फ ऑर्डर और GMV बढ़ाना ही सफलता का पैमाना नहीं है। कंपनियों को यह भी दिखाना होगा कि हर डिलीवरी के बाद उनके पास कितना पैसा बचता है।

Amazon और Flipkart की एंट्री से बढ़ा मुकाबला

क्विक कॉमर्स अब कुछ चुनिंदा कंपनियों तक सीमित बाजार नहीं रह गया है। Amazon और Flipkart भी इस क्षेत्र में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं।

Amazon भारत में 2030 तक 48 अरब डॉलर निवेश करने की योजना के साथ अपना दांव मजबूत कर रहा है। वहीं Flipkart अपने Quick Commerce प्लेटफॉर्म Minutes को तेजी से विस्तार दे रहा है। इसका मतलब है कि आने वाले समय में क्विक कॉमर्स की लड़ाई सिर्फ मौजूदा खिलाड़ियों के बीच नहीं होगी, बल्कि बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियां भी इस बाजार में मुकाबला करेंगी।

दूसरी तरफ Zepto ने अपनी IPO योजना को फिलहाल रोक दिया है। कंपनी के वैल्यूएशन और मुनाफे को लेकर सवाल उठाए गए हैं। Swiggy ने Instamart में नेतृत्व स्तर पर बदलाव किया है, जबकि BigBasket में भी नया CEO नियुक्त किया गया है।

अब ‘ग्रोथ एट ऑल कॉस्ट’ की रणनीति पर सवाल

क्विक कॉमर्स की शुरुआती सफलता में भारी डिस्काउंट, फ्री डिलीवरी और नए ग्राहकों को जोड़ने पर बड़े खर्च की भूमिका रही। इससे लोगों में कम समय में सामान मंगाने की आदत बनी, लेकिन कंपनियों के लिए कारोबार की लागत भी बढ़ती गई।

अब इस मॉडल में बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। UBS की रिसर्च के मुताबिक पिछले तीन-चार महीनों में डिस्काउंट लगभग 19-20 फीसदी के आसपास स्थिर हुए हैं। अक्टूबर 2025 से मार्च 2026 के बीच यह आंकड़ा करीब 24-27 फीसदी था।

हालांकि डिस्काउंट कम होने से अपने आप मुनाफा सुनिश्चित नहीं होता। BigBasket के वित्त वर्ष 2026 के आंकड़े इस चुनौती को दिखाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार कंपनी ने 1 रुपये का राजस्व हासिल करने के लिए करीब 1.37 रुपये खर्च किए, यानी हर 100 रुपये के राजस्व पर करीब 37 रुपये का नुकसान हुआ।

डार्क स्टोर की उत्पादकता बनेगी बड़ा फैक्टर

क्विक कॉमर्स के कारोबार में डार्क स्टोर बेहद महत्वपूर्ण हैं। ये ऐसे स्थानीय स्टोर या माइक्रो-फुलफिलमेंट सेंटर होते हैं, जहां सामान रखा जाता है और आसपास के ग्राहकों के ऑर्डर तेजी से पूरे किए जाते हैं।

लेकिन अब केवल ज्यादा डार्क स्टोर खोलना पर्याप्त नहीं है। कंपनियों को मौजूदा नेटवर्क से ज्यादा ऑर्डर और बेहतर उत्पादकता हासिल करनी होगी। विशेषज्ञों के मुताबिक एक सामान्य डार्क स्टोर को ब्रेक-ईवन तक पहुंचने के लिए रोजाना करीब 1,100-1,200 ऑर्डर की जरूरत हो सकती है। हालांकि यह संख्या शहर, लोकेशन और रियल एस्टेट लागत के हिसाब से बदल सकती है।

यही वजह है कि Blinkit अब केवल नेटवर्क बढ़ाने के बजाय अपने मौजूदा नेटवर्क की उत्पादकता बढ़ाने पर भी ध्यान दे रही है।

क्विक कॉमर्स का बाजार अभी भी बड़ा

प्रतिस्पर्धा बढ़ने के बावजूद भारत में क्विक कॉमर्स के विस्तार की संभावनाएं काफी बड़ी हैं। रिपोर्ट के अनुसार Google और Deloitte को उम्मीद है कि भारत का क्विक-कॉमर्स बाजार 2030 तक 250 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। अप्रैल 2026 तक इस इंडस्ट्री का आकार करीब 50 अरब डॉलर आंका गया था।

ऑनलाइन ग्रॉसरी मार्केट के लिए भी लंबी अवधि में बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं। भारत में शहरी इलाकों की कुल ग्रॉसरी खपत में ऑनलाइन ग्रॉसरी की हिस्सेदारी अभी भी करीब 1-2 फीसदी बताई गई है। इसका अर्थ है कि बड़ी संख्या में ग्राहक अभी भी पारंपरिक दुकानों से सामान खरीदते हैं।

इसलिए कंपनियों के सामने बाजार बढ़ाने की काफी गुंजाइश है। असली चुनौती यह होगी कि नए शहरों और नए ग्राहकों तक पहुंचते समय कारोबार को मुनाफे में कैसे रखा जाए।

सिर्फ ग्रॉसरी पर निर्भर नहीं रहना चाहती कंपनियां

क्विक कॉमर्स में ग्रॉसरी सबसे बड़ा सेगमेंट है, लेकिन कम मार्जिन के कारण कंपनियां अब दूसरे प्रोडक्ट कैटेगरी की ओर भी बढ़ रही हैं। Redseer के अनुमान के मुताबिक क्विक कॉमर्स के कुल GMV में ग्रॉसरी की हिस्सेदारी करीब 71 फीसदी है।

बाकी हिस्से में ब्यूटी, पर्सनल केयर और अन्य नॉन-ग्रॉसरी प्रोडक्ट शामिल हैं। ब्यूटी और पर्सनल केयर की हिस्सेदारी अकेले 8 फीसदी से ज्यादा बताई गई है।

इन कैटेगरी में कंपनियों को बेहतर मार्जिन मिलने की उम्मीद रहती है। इसी वजह से क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म प्राइवेट लेबल ब्रांड्स पर भी ध्यान दे रहे हैं। अपने ब्रांड के प्रोडक्ट बेचने से कंपनियों को कीमत और मार्जिन पर ज्यादा नियंत्रण मिल सकता है।

छोटे शहरों में विस्तार अगली बड़ी चुनौती

क्विक कॉमर्स का अगला चरण सिर्फ बड़े महानगरों तक सीमित नहीं रहने वाला। कंपनियां Tier-II और Tier-III शहरों में भी विस्तार कर रही हैं।

Deloitte-FICCI की रिपोर्ट के अनुसार Tier-II और Tier-III शहर भारत के कुल ई-कॉमर्स ट्रांजैक्शन में 60 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी रखते हैं। Deloitte को उम्मीद है कि 2030 तक Tier-II शहर क्विक-कॉमर्स खर्च में करीब 30 फीसदी हिस्सेदारी हासिल कर सकते हैं।

लेकिन छोटे शहरों में मॉडल की लागत अलग होगी। एक डार्क स्टोर से ज्यादा बड़ा इलाका कवर करना पड़ सकता है और 10-15 मिनट की जगह 30 मिनट की डिलीवरी अधिक व्यावहारिक हो सकती है।

यहीं पर कंपनियों के लिए चुनौती बढ़ती है, क्योंकि किसी छोटे शहर में एक साथ कई प्रतिस्पर्धी डार्क स्टोर नेटवर्क को मुनाफे में चलाना आसान नहीं होगा।

आगे किसकी होगी जीत?

क्विक कॉमर्स की अगली लड़ाई सिर्फ इस बात पर नहीं होगी कि कौन सबसे तेजी से सामान पहुंचाता है। आने वाले समय में सफल वही कंपनी हो सकती है जो अपने स्टोर नेटवर्क को ज्यादा उत्पादक बनाए, ग्राहकों को बार-बार खरीदारी के लिए जोड़े और ज्यादा मार्जिन वाले प्रोडक्ट्स का कारोबार बढ़ाए।

इस सेक्टर में कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, लेकिन बाजार का आकार भी तेजी से बढ़ने की संभावना है। इसलिए आने वाले वर्षों में कुछ नए खिलाड़ी मजबूत हो सकते हैं, जबकि कुछ कंपनियों को अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है।

कुल मिलाकर भारत के क्विक-कॉमर्स सेक्टर में अब ‘ग्रोथ एट ऑल कॉस्ट’ का दौर धीरे-धीरे बदलता दिखाई दे रहा है। अब निवेशकों और कंपनियों का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने ऑर्डर मिल रहे हैं, बल्कि यह है कि उन ऑर्डर से टिकाऊ मुनाफा कितना कमाया जा सकता है।

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