“10 रुपये का डायपर नहीं लीक होता, लेकिन सरकार के पेपर लीक हो जाते हैं!”

देश में एक तरफ कंपनियां अपने 10 रुपये के डायपर तक की “लीक प्रूफ गारंटी” देती हैं, वहीं दूसरी तरफ करोड़ों युवाओं के भविष्य से जुड़े सरकारी भर्ती और प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र बार-बार लीक हो रहे हैं। यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि मेहनतकश गरीब युवाओं के सपनों पर सीधा हमला है।
गरीब परिवार का बच्चा दिन-रात मेहनत करता है। कोई खेतों में मजदूरी करके कोचिंग की फीस भरता है, कोई पिता की छोटी सी दुकान संभालते हुए रात भर पढ़ाई करता है, तो कोई मां अपने गहने बेचकर बेटे-बेटी को पढ़ाती है। लेकिन परीक्षा से पहले ही जब पर्चा बाजार में बिक जाता है, तब केवल एक पेपर नहीं लीक होता, बल्कि लाखों परिवारों की उम्मीदें, विश्वास और वर्षों की मेहनत भी लीक हो जाती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतनी बड़ी-बड़ी सुरक्षा व्यवस्थाओं, सर्वर, एजेंसियों और सरकारी दावों के बावजूद हर बार पेपर कैसे बाहर आ जाता है? क्या सिस्टम इतना कमजोर हो चुका है कि कुछ लालची लोग पैसे के दम पर युवाओं का भविष्य खरीद लें? अगर एक निजी कंपनी अपने छोटे से उत्पाद की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है, तो सरकार देश के युवाओं के भविष्य की सुरक्षा क्यों नहीं कर पा रही?
आज देश का युवा बेरोजगारी से पहले ही परेशान है। ऊपर से पेपर लीक की घटनाएं उसके आत्मविश्वास को तोड़ रही हैं। वर्षों की तैयारी, हजारों रुपये की फीस, किराया, कोचिंग और मानसिक तनाव—सब कुछ एक झटके में बर्बाद हो जाता है। जिन युवाओं ने ईमानदारी से मेहनत की, उन्हें फिर से परीक्षा का इंतजार करना पड़ता है,
सरकार हर बार जांच, कार्रवाई और सख्त कानून की बात करती है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर कब तक सिर्फ बयानबाजी चलेगी? युवाओं को आश्वासन नहीं, सुरक्षित और पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था चाहिए। पेपर लीक अब केवल अपराध नहीं रहा, यह देश की शिक्षा व्यवस्था और सरकारी तंत्र की विश्वसनीयता पर लगा गहरा दाग बन चुका है।

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