Rajasthan Nikay Chunav: नतीजों के बाद तेज हुई ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’, पार्षदों की बाड़ाबंदी से सियासी हलचल

Rajasthan Nikay Chunav: राजस्थान में निकाय चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद अब नगर निकायों में बोर्ड गठन को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। कई जगह किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण निर्दलीय पार्षदों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। इसी बीच विजयी पार्षदों को होटल और रिसॉर्ट में ठहराए जाने की खबरों के साथ राजस्थान की स्थानीय राजनीति में ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ की चर्चा शुरू हो गई है।

अलवर, खैरथल, कोटपूतली, भिवाड़ी, बहरोड़ और आसपास के क्षेत्रों में चुनाव परिणाम के बाद राजनीतिक गतिविधियां बढ़ी हैं। कांग्रेस और बीजेपी अपने-अपने विजयी पार्षदों को एक साथ रखने की कोशिश कर रहे हैं। इस बीच विपक्ष की ओर से पार्षदों को लेकर आरोप भी लगाए गए हैं और पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं।

नतीजों के बाद बोर्ड बनाने की कवायद

राजस्थान निकाय चुनाव में पार्षदों के चुनाव पूरे होने के बाद अब विभिन्न नगर निकायों में बोर्ड गठन की प्रक्रिया पर राजनीतिक दलों का ध्यान है। अलवर नगर निगम में 60 वार्डों में बीजेपी ने 28 और कांग्रेस ने 23 वार्ड जीते हैं। बाकी सीटें अन्य दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के खाते में गई हैं। ऐसे समीकरण में बोर्ड बनाने के लिए निर्दलीय पार्षदों का समर्थन महत्वपूर्ण हो सकता है।

इसी तरह कोटपूतली और भिवाड़ी समेत दूसरे निकायों में भी निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत के कारण बोर्ड गठन के समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। यही वजह है कि चुनाव परिणाम आने के बाद राजनीतिक दल अपने-अपने पार्षदों को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं।

होटल और रिसॉर्ट में ठहराए गए पार्षद

चुनाव के बाद कांग्रेस और बीजेपी दोनों के विजयी पार्षदों को अलग-अलग जगहों पर ठहराए जाने की जानकारी सामने आई है। इसका उद्देश्य बोर्ड गठन के समय पार्षदों के पाला बदलने की किसी भी संभावना को रोकना बताया जा रहा है। जयपुर में भी दोनों प्रमुख दलों के पार्षदों को अलग-अलग रिसॉर्ट में ठहराए जाने की रिपोर्ट सामने आई है।

अलवर में भी कांग्रेस के विजयी पार्षदों को होटल में एक साथ रखने और पार्टी की रणनीति पर चर्चा किए जाने की जानकारी सामने आई। स्थानीय निकायों में बोर्ड गठन से पहले इस तरह की राजनीतिक रणनीति को ही फिलहाल ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ कहा जा रहा है।

पार्षदों की ‘बोली’ के आरोप

चुनाव परिणाम के बाद राजस्थान में पार्षदों को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हुए हैं। रिपोर्ट में पार्षदों की करोड़ों रुपये में बोली लगने की बात सामने आने का उल्लेख है। हालांकि, यह एक राजनीतिक आरोप है और इसे स्वतंत्र रूप से पुष्ट तथ्य के तौर पर नहीं रखा जा सकता।

विपक्ष की ओर से आरोप लगाया गया है कि विजयी पार्षदों को दूसरे दलों के साथ जाने से रोकने और अपने पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए अलग-अलग स्थानों पर रखा जा रहा है।

‘पार्षद चोरी’ के आरोप से गरमाया मामला

अलवर, खैरथल, कोटपूतली, भिवाड़ी और बहरोड़ समेत कई क्षेत्रों में विजयी पार्षदों को लेकर विवाद की खबरें सामने आई हैं। कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली भी जीते हुए कांग्रेस प्रत्याशियों के साथ पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचे।

टीकाराम जूली ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि पुलिस का इस्तेमाल पार्षदों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए किया जा रहा है। कुछ निर्दलीय पार्षदों की ओर से भी पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जाने की जानकारी सामने आई है।

जयपुर में भी सामने आया विवाद

पार्षदों की बाड़ाबंदी को लेकर जयपुर में भी विवाद की स्थिति सामने आई। रिपोर्ट के मुताबिक, एक रिसॉर्ट में ठहराए गए कांग्रेस पार्षदों को निकालने के लिए फॉरेस्ट विभाग की टीम वहां पहुंची, जिसके बाद हंगामा हुआ।

राजगढ़ क्षेत्र में भी एक निर्दलीय प्रत्याशी को लेकर विवाद सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार, एक निर्दलीय पार्षद को कथित तौर पर गाड़ी में बैठाकर ले जाने का मामला सामने आया था। इस घटनाक्रम का वीडियो वायरल होने के बाद मामला चर्चा में आया। हालांकि, इस घटना को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं।

बहरोड़ और नीमराणा में भी विवाद

कोटपूतली-बहरोड़ क्षेत्र में भी निकाय चुनाव के बाद पार्षदों को लेकर विवाद सामने आया। बहरोड़ में वार्ड नंबर 7 से निर्दलीय प्रत्याशी रेखा अग्रवाल के पति संजय अग्रवाल को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। इसके बाद विरोध प्रदर्शन हुए और बाद में पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया।

नीमराणा में भी चुनाव के बाद विवाद की स्थिति बनी। प्रतापसिंहपुरा वार्ड नंबर 5 से निर्वाचित पार्षद सुमन देवी के प्रतिनिधि चंदन सैनी को पुलिस एक होटल से हिरासत में लेकर थाने लाई। इसके बाद बड़ी संख्या में लोग थाने पहुंचे और उनकी रिहाई की मांग की।

बोर्ड गठन तक जारी रह सकती है सियासी हलचल

राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजों के बाद अब विभिन्न नगर निकायों में बोर्ड गठन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो गई है। जहां किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है, वहां निर्दलीय और अन्य दलों के पार्षदों का समर्थन समीकरण बदल सकता है।

ऐसे में राजनीतिक दल अपने विजयी पार्षदों को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं। होटल और रिसॉर्ट में पार्षदों को ठहराने से लेकर पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर उठ रहे सवालों तक, निकाय चुनाव के बाद राजस्थान की स्थानीय राजनीति में गतिविधियां तेज बनी हुई हैं।

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