आखिर डॉक्टर को लोग ‘लुटेरा’ क्यों कहते हैं? — एक कड़वा सच, जिसे समझना भी जरूरी है

-डॉ मदन जैन की कलम से 

जब किसी व्यक्ति को गंभीर बीमारी घेर लेती है, सड़क दुर्घटना हो जाए, दिल का दौरा पड़ जाए या घर का कोई सदस्य जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा हो, तब सबसे पहले जिस व्यक्ति की ओर उम्मीद भरी निगाहें उठती हैं, वह डॉक्टर ही होता है। लेकिन विडंबना यह है कि वही डॉक्टर कई बार समाज के एक वर्ग द्वारा “लुटेरा” कहकर संबोधित किया जाता है।
आखिर ऐसा क्यों है? क्या वास्तव में डॉक्टर लुटेरे हैं, या इसके पीछे व्यवस्था की खामियां और लोगों की मजबूरियां जिम्मेदार हैं?
आज चिकित्सा क्षेत्र अत्याधुनिक तकनीकों, महंगे उपकरणों और उच्च स्तरीय उपचार पद्धतियों पर आधारित हो चुका है। एक अस्पताल को संचालित करने के लिए करोड़ों रुपये के उपकरण, प्रशिक्षित स्टाफ, दवाइयां, बिजली, रखरखाव और अनेक प्रशासनिक खर्च उठाने पड़ते हैं। ऐसे में इलाज की लागत बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन जब मरीज या उसके परिजन भारी-भरकम बिल देखते हैं, तो उनका दर्द और आर्थिक बोझ गुस्से में बदल जाता है और सबसे आसान निशाना डॉक्टर बन जाता है।
यह भी सच है कि कुछ निजी अस्पतालों और कुछ चिकित्सकों पर अनावश्यक जांचें लिखने, महंगी दवाइयां देने या आर्थिक लाभ को प्राथमिकता देने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे कुछ मामलों ने पूरे चिकित्सा समुदाय की छवि को नुकसान पहुंचाया है। एक-दो गलत उदाहरणों के कारण लाखों ईमानदार डॉक्टरों पर भी सवाल उठने लगते हैं।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। एक डॉक्टर बनने के लिए वर्षों की कठिन पढ़ाई, दिन-रात की मेहनत, मानसिक तनाव और भारी आर्थिक निवेश करना पड़ता है। त्योहार हो, रात हो या छुट्टी, डॉक्टर अक्सर मरीजों की सेवा में लगे रहते हैं। कई बार वे अपनी जान जोखिम में डालकर भी दूसरों की जिंदगी बचाने का प्रयास करते हैं।
सोचिए, जब कोई मरीज स्वस्थ होकर घर लौटता है तो परिवार खुशियां मनाता है, लेकिन जब इलाज के बावजूद मरीज को बचाया नहीं जा सके, तो पूरा दोष डॉक्टर पर मढ़ दिया जाता है। जबकि चिकित्सा विज्ञान कोई जादू नहीं है, बल्कि संभावनाओं और प्रयासों का विज्ञान है।
समाज को यह समझना होगा कि हर डॉक्टर लुटेरा नहीं होता और हर अस्पताल मुनाफाखोर नहीं होता। वहीं चिकित्सा क्षेत्र को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि मरीज के साथ पारदर्शिता, संवेदनशीलता और नैतिकता बनी रहे। विश्वास और संवाद ही वह पुल है जो डॉक्टर और मरीज के रिश्ते को मजबूत बना सकता है।
डॉक्टर केवल पेशा नहीं, बल्कि सेवा और जिम्मेदारी का नाम है। कुछ गलत लोगों की वजह से पूरे चिकित्सक समाज को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं। जिस हाथ को हम जीवनदाता कहते हैं, उसे केवल बिल देखकर लुटेरा कह देना भी न्याय नहीं है।
जरूरत है व्यवस्था में सुधार की, पारदर्शिता की और एक-दूसरे की परिस्थितियों को समझने की। क्योंकि जब जिंदगी संकट में होती है, तब उम्मीद की आखिरी किरण अक्सर डॉक्टर ही होता है।

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