संतों की चेतावनी आज भी कायम, सोशल मीडिया पर ट्रेंड हुआ जीव दया का संदेश

  • रिपोर्ट: प्राची सिंह

समय के साथ दुनिया भले ही आधुनिकता की ओर तेजी से बढ़ रही हो, लेकिन भारत की संत परंपरा का मूल संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक बना हुआ है। सदियों पहले संत कबीर दास जी ने मानवता, करुणा और जीव दया का जो मार्ग दिखाया था, आज के संत भी उसी सीख को समाज तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। वर्तमान दौर में सात्विक जीवन और अहिंसा का यह संदेश लोगों के बीच नई चर्चा का विषय बन गया है।

इन दिनों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) पर #जैसादर्दअपनेहो_ऐसाजान_बिरानै हैशटैग तेजी से वायरल हो रहा है। अध्यात्म और मानवता से जुड़े इस अभियान ने लाखों लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। डिजिटल युग में कबीर दास जी की अमर वाणी पर आधारित यह संदेश लोगों को जीवों के प्रति संवेदनशील बनने की प्रेरणा दे रहा है।

संतों के अनुसार, जिस प्रकार इंसान को चोट लगने पर दर्द होता है, उसी तरह हर बेजुबान जीव भी पीड़ा महसूस करता है। केवल स्वाद या स्वार्थ के लिए किसी जीव को कष्ट देना अध्यात्म की दृष्टि में बड़ा पाप माना गया है। यही कारण है कि संत समाज लगातार करुणा और दया का संदेश दे रहा है।

इस विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाने में संत रामपाल जी महाराज के अनुयायी सोशल मीडिया और सत्संगों के माध्यम से सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। आध्यात्मिक पुस्तकों और डिजिटल अभियानों के जरिए सात्विक जीवनशैली अपनाने का संदेश तेजी से फैलाया जा रहा है।

वहीं, अपनी बेबाक आध्यात्मिक वाणी के लिए चर्चित श्रद्धेय प्रेमानंद जी महाराज भी मांसाहार और हिंसा के खिलाफ खुलकर बोलते रहे हैं। उनका मानना है कि किसी मूक जीव को पीड़ा देकर इंसान कभी वास्तविक सुख और मानसिक शांति प्राप्त नहीं कर सकता, क्योंकि हर जीव में परमात्मा का अंश मौजूद है।

संतों की शिक्षाओं में नशा, हिंसा और मांसाहार को मनुष्य के विवेक और आध्यात्मिक विकास के लिए घातक बताया गया है। उनका कहना है कि तामसिक भोजन और व्यसन व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित करते हैं और उसे आध्यात्मिक पतन की ओर ले जाते हैं।

संत समाज कर्मों के सिद्धांत की भी याद दिलाता है। उनके अनुसार, प्रकृति का नियम स्पष्ट है कि जो पीड़ा हम दूसरों को देते हैं, वही किसी न किसी रूप में भविष्य में हमारे पास लौटकर आती है। इसलिए जीव दया और करुणा को मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म माना गया है।

आज के समय में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में कहीं हम अपनी संस्कृति और संतों की मूल शिक्षाओं से दूर तो नहीं होते जा रहे। ऐसे दौर में करुणा, अहिंसा और सात्विकता का संदेश समाज के लिए पहले से कहीं अधिक जरूरी माना जा रहा है।

About The Author

Leave A Reply

Your email address will not be published.