देवी लाल को जनता दल संसदीय पार्टी का नेता चुनना चन्द्र शेखर को वीपी सिंह के मुकाबले चुनाव लड़ने से रोकने की रणनीति थी

गुस्ताख़ी माफ़ हरियाणा — पवन कुमार बंसल

सियासत के गलियारों में कई फैसले खुले मंच पर होते दिखते हैं, लेकिन उनकी असली पटकथा अक्सर पर्दे के पीछे लिखी जाती है। ऐसा ही एक दिलचस्प अध्याय जुड़ा है देवीलाल, वी.पी. सिंह और चंद्रशेखर के दौर से।

यह तो सर्वविदित है कि जनता दल के संसदीय दल की बैठक में सर्वसम्मति से नेता चुने गए देवीलाल ने खुद ही यह पद वी.पी. सिंह को सौंप दिया। सीधी बात थी—अगर वे ऐसा न करते, तो देश के प्रधानमंत्री वही बनते। लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है।

दरअसल, उस समय यह आशंका गहराई से महसूस की जा रही थी कि यदि सीधे वी.पी. सिंह का नाम आगे बढ़ाया गया, तो चंद्रशेखर मुकाबले में उतर सकते हैं। इससे न केवल पार्टी के भीतर विभाजन का संदेश जाता, बल्कि जनता में भी गलत संकेत जाता—खासतौर पर तब, जब चुनाव पहले ही वी.पी. सिंह के चेहरे पर लड़ा गया था।

ऐसे में रणनीति बनी। उच्च स्तर पर विचार-विमर्श के बाद तय हुआ कि पहले देवीलाल का नाम प्रस्तावित किया जाए। यह एक ऐसा नाम था, जिसका खुलकर विरोध करना किसी के लिए आसान नहीं था। योजना साफ थी—देवीलाल को सर्वसम्मति से नेता चुना जाए और फिर वे स्वयं वी.पी. सिंह के नाम का प्रस्ताव रख दें।

और ठीक वैसा ही हुआ।

यह सियासी शतरंज की एक सोची-समझी चाल थी, जिसमें हर मोहरे की भूमिका तय थी। उस दौर में देवीलाल, वी.पी. सिंह के बड़े प्रशंसक माने जाते थे। उनका मशहूर नारा गूंजता था—
“राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है।”

लेकिन राजनीति में रिश्ते स्थायी नहीं होते। सरकार बनने के बाद दोनों नेताओं के बीच मतभेद उभरने लगे। और वही देवीलाल, जो कभी वी.पी. सिंह के गुणगान करते थे, बाद में तीखे विरोधी बन गए। उनका बदला हुआ नारा था—
“राजा नहीं रंक है, देश पर कलंक है।”

यही है भारतीय राजनीति का यथार्थ—जहां दोस्ती और विरोध, दोनों ही समय और परिस्थिति के साथ करवट बदलते रहते हैं i

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