धार-झाबुआ-अलीराजपुर की आदिवासी संस्कृति की छटा बिखरेगी इंदौर में

'जात्रा-2026' पहली बार शहर को कराएगा आदिवासी जीवन से सीधा परिचय

इंदौर, 28 जनवरी, 2026: यदि किसी संस्कृति को सच में समझना हो, तो उसे किताबों में नहीं, लोगों के बीच जाकर ही महसूस करना पड़ता है। इसी एहसास को लेकर इंदौर में पहली बार ऐसा आयोजन होने जा रहा है, जहाँ धार, झाबुआ और अलीराजपुर की आदिवासी संस्कृति शहर के बीचों-बीच साँस लेती नजर आएगी। नाम है- ‘जात्रा-2026’।

जनजातीय सामाजिक सेवा समिति के तत्वावधान में होने वाला यह तीन दिवसीय महोत्सव 20 से 22 फरवरी, 2026 तक इंदौर के ऐतिहासिक गांधी हॉल परिसर में आयोजित होगा, जिसका पीआर पार्टनर पीआर 24×7 है। इन तीन दिनों में गांधी हॉल सिर्फ एक इमारत नहीं रहेगा, बल्कि वह आदिवासी जीवन, रंगों, लोकधुनों और परंपराओं का जीवंत मंच बन जाएगा।

धार, झाबुआ और अलीराजपुर, ये तीनों जिले अपनी अलग पहचान रखते हैं। कहीं भगोरिया की मस्ती है, कहीं सादगी में रची-बसी जीवनशैली, तो कहीं लोककला और परंपराओं की गहरी जड़ें। ‘जात्रा-2026’ इन सभी रंगों को एक साथ लेकर आ रहा है, ताकि शहर का आम दर्शक आदिवासी संस्कृति को सिर्फ देखे नहीं, बल्कि उसे महसूस भी कर सके।

जनजातीय सामाजिक सेवा समिति के अध्यक्ष देवकीनंदन तिवारी ने बताया कि इस आयोजन में प्रवेश नि:शुल्क रहेगा। शहरवासियों के लिए यहाँ 100 से ज्यादा स्टॉल रहेंगे, जहाँ से वे आदिवासियों के पारंपरिक व्यंजन व अन्य सामग्री को देख और खरीद भी सकेंगे। इस आयोजन की खास बात संस्था ट्रायबल फाउंडेशन द्वारा लगाई जाने वाली पिथोरा आर्ट गैलेरी होगी, जिसमें 25 से ज्यादा पेंटिंग्स देखने को मिलेंगी। इस दौरान, आदिवासी समाज की आस्था, जीवन और प्रकृति से रिश्ता चित्रों के माध्यम से सामने आएगा। हमू काका बाबा न पोरिया फेम आनंदीलाल भावेल अपने नृत्य ग्रुप के साथ कार्यक्रम में लाइव प्रस्तुति भी देंगे।

जनजातीय सामाजिक सेवा समिति के कोषाध्यक्ष श्री गिरीश चव्हाण ने बताया कि मालवा-निमाड़ के धार, झाबुआ और अलीराजपुर जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों की ऐसी प्रतिभाओं का सम्मान भी गणमान अतिथियों के द्वारा किया जाएगा, जिन्होंने देशभर में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। इसमें आदिवासी समाज के ही सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर से लेकर फिल्मों में अपनी प्रतिभा बिखेरने और पद्मश्री पाने वाले भी शामिल हैं। ‘जात्रा-2026’ भी इसी सांस्कृतिक अभियान की कड़ी है, जो जनजातीय लोककला, बोली, परंपरा और पहचान के संरक्षण एवं संवर्धन को समर्पित है।

आयोजन में आदिवासी कलाकारों की कला और हस्तशिल्प प्रदर्शनी होगी, जहाँ हर वस्तु अपने साथ एक कहानी लेकर आएगी। पारंपरिक व्यंजनों के स्टॉल आदिवासी स्वाद से परिचय कराएँगे, जो आज भी प्रकृति और मौसम के साथ जुड़े हुए हैं। अलग-अलग अंचलों से आए कलाकार अपने लोकनृत्यों और पारंपरिक प्रस्तुतियों के ज़रिए आदिवासी उत्सवों की ऊर्जा को मंच पर उतारेंगे।

वहीं, भगोरिया पर्व पर आधारित फोटोग्राफी प्रदर्शनी कैमरे के ज़रिए आदिवासी समाज के प्रेम, आज़ादी और सामूहिक उत्सव को दर्शाएगी। इसके साथ ही जनजातीय साहित्य और परिधानों से जुड़े स्टॉल आदिवासी बोली और पहचान की दुनिया से जोड़ेंगे।

‘जात्रा-2026’ को खास बनाता है इसका उद्देश्य, यह किसी संस्कृति को मंच पर सजाने भर का आयोजन नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज को समझने और उसके साथ संवाद करने की पहल है। यही वजह है कि यह आयोजन इंदौर में नहीं, बल्कि देश में पहली बार इस रूप में हो रहा है।

‘जात्रा-2026’ के प्रमुख आकर्षण होंगे:
* जनजातीय कलाकारों द्वारा कला एवं हस्तशिल्प प्रदर्शनी
* जनजातीय समाज के पारंपरिक व्यंजनों के विशेष स्टॉल
* विभिन्न अंचलों के जनजातीय नृत्य और लोक नृत्यों की प्रस्तुतियां
* जनजातीय जीवन और परंपरा को दर्शाती ‘पिथोरा’ आर्ट गैलरी
* जनजातीय पर्व भगौरिया पर आधारित फोटो प्रदर्शनी
* जनजातीय साहित्य और परिधानों के स्टॉल

तीन दिन तक चलने वाला यह महोत्सव शहर को याद दिलाएगा कि आधुनिकता की दौड़ में भी हमारी जड़ें आज भी जीवित हैं और उन्हीं जड़ों में भारत की असली पहचान बसती है।

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