अयोध्या के पावन घाटों पर इस वर्ष दीपावली ने भव्यता की पराकाष्ठा को स्पर्श किया। लगभग 56 लाख दीपों की अलौकिक ज्योति ने न केवल सरयू तट को स्वर्णाभ आभा से आलोकित किया, बल्कि विश्व कीर्तिमानों में भी भारत का नाम अमिट रूप से अंकित कर दिया। ऐसा प्रतीत हुआ मानो स्वयं त्रेतायुग पुनः अवतरित हो गया हो—जैसे प्रभु श्रीराम का स्वागत पुनः पुष्पक विमान से उतरते समय समस्त अयोध्या ने दीपों के महासागर से किया हो।
परंतु, भव्यता की इस सुनहरी पर्त के नीचे एक मौन, मगर गूंजता हुआ यथार्थ भी है—वह दृश्य जब इन्हीं दीपों से शेष रह गया तेल अंधियारे में जीवन काटते लोग इकट्ठा करते दिखे। यह दृश्य किसी भूख की परिभाषा नहीं, बल्कि विकास और दिखावे के द्वंद्व का जीवंत दस्तावेज़ था। यह प्रश्न उठाता है कि क्या यही वह “रामराज्य” है, जिसकी कल्पना मर्यादा पुरुषोत्तम ने की थी—जहां प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में समता, संपन्नता और संतोष का प्रकाश फैला हो?
सच यह है कि आज के रामराज्य में प्रकाश असमान रूप से वितरित है। एक ओर करोड़ों दीपक प्रज्ज्वलित कर विश्व रिकॉर्ड बनाए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर गरीब के घर का एक दीप बुझने न पाए इसके लिए वह बचे तेल की बूंदों को भी संजोने को विवश है। यह आडंबर और अभाव का विरोधाभास हमारी सामाजिक संरचना की गहराई तक व्याप्त विडम्बना को उजागर करता है।
अयोध्या के घाटों पर जगमगाते दीप केवल श्रद्धा के प्रतीक नहीं थे, वे राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रदर्शन का माध्यम भी बन चुके हैं। धर्म का यह सार्वजनिक उत्सव जब सत्ता के सौंदर्यशास्त्र से जुड़ जाता है, तब भावनाएं भव्यता में बदल जाती हैं और संवेदनाएं परिधि से विलुप्त। जब हम “विजयादशमी” के नायक की जयगाथा गाते हैं, तब यह भी याद रखना चाहिए कि विजय का वास्तविक अर्थ तभी है जब पराजितों का भी उद्धार हो।
यह दृश्य—जहां सरयू किनारे दीपों का महासागर दमक रहा था और किनारे बैठा एक मजदूर बुझ चुके दीपों का तेल संजो रहा था—हमारी नीतियों के प्रतीकात्मक द्वैत को उजागर करता है। एक ओर विश्व रिकॉर्ड, दूसरी ओर रोटी और तेल का संघर्ष। एक ओर रामराज्य का उद्घोष, दूसरी ओर दीनता का मौन विलाप।
रामराज्य का वास्तविक सार सत्ता की वैभवशाली आभा में नहीं, बल्कि जनकल्याण की संवेदनशील नीतियों में निहित है। वह राज्य जहां कोई तेल नहीं, बल्कि आशा संजोता दिखे; जहां दीप जलाने के लिए किसी को प्रतीक्षा न करनी पड़े; जहां प्रकाश केवल घाटों पर नहीं, जनजीवन के अंधेरों में भी समान रूप से फैले—तभी हम कह सकेंगे कि दीपोत्सव का उद्देश्य पूर्ण हुआ है।
आज आवश्यकता है उस आत्ममंथन की, जो यह पूछ सके—क्या हमने दीप जलाए, या केवल अपनी छवि को रोशन किया?
क्योंकि जब तक रामराज्य के दीप सभी के घरों तक नहीं पहुंचते, तब तक हर रिकॉर्ड के पीछे एक अदृश्य अंधकार बना रहेगा।
