“आत्मनिर्भरता का मुखौटा और आयात की गुलामी”

  • रिपोर्ट – मनोज कुमार यादव

देश आज “आत्मनिर्भर भारत” का नारा बुलंद कर रहा है, परंतु हकीकत यह है कि हम निर्यात से अधिक आयात करने वाले राष्ट्र के रूप में विश्व बाजार की दया पर निर्भर हैं। यह विरोधाभास केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नीतिगत दिवालियापन का दर्पण है। हम गर्व से स्वदेशी की बात करते हैं, किंतु हमारी अर्थव्यवस्था विदेशी वस्तुओं की बैसाखी पर खड़ी है।
हर साल अरबों डॉलर के आयात बिल के नीचे हमारी मुद्रा की सांसें घुटती हैं, जबकि सरकार मंचों पर आत्मनिर्भरता का विजयघोष करती है। पेट्रोलियम उत्पादों से लेकर मोबाइल चिप्स, दवाइयों के रॉ-मटेरियल से लेकर खिलौनों तक—हर क्षेत्र में विदेशी निर्भरता का साम्राज्य स्थापित है। हम उत्पादन नहीं, उपभोग के उस्ताद बन चुके हैं। यह स्थिति किसी राष्ट्र की समृद्धि नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक परतंत्रता का जीवंत प्रतीक है।
वास्तविक आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल नारेबाज़ी नहीं, बल्कि स्वदेशी उद्योगों को सशक्त करने, तकनीकी शोध में निवेश बढ़ाने और आयात-निर्यात के संतुलन को साधने से है। पर अफसोस, नीतियों का झुकाव विदेशी निवेश के मोहपाश में बंधा हुआ है। विदेशी कंपनियों के लिए लाल कालीन बिछाकर हम अपनी ही आर्थिक जड़ों को खोखला कर रहे हैं।
कब तक हम विदेशी ब्रांडों की चमक में अपनी स्वाभिमान की लौ बुझाते रहेंगे? कब तक आत्मनिर्भरता का मुखौटा पहनकर आयात की गुलामी में जीते रहेंगे?
अगर सचमुच आत्मनिर्भर बनना है, तो हमें अपने उद्योगों, किसानों, वैज्ञानिकों और श्रमिकों को आयात निर्भर नीतियों से मुक्त करना होगा। वरना “विकास” और “आत्मनिर्भरता” शब्द केवल भाषणों की शोभा बनकर रह जाएंगे और भारत अपनी ही अर्थव्यवस्था का उपभोक्ता बनकर रह जाएगा।

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