वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या और “राम आयेंगे” की विडंबना
क्या हमने राम को बुलाने से पहले राम जैसा बनना सीखा है?
- संवाददाता – मनोज कुमार यादव
नई दिल्ली, 6 अगस्त। भारत – एक ऐसा देश जहाँ माता-पिता को देवता मानने की परंपरा है, जहाँ संस्कार और परिवार जीवन की नींव माने जाते हैं, वहीं आज वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या और उनमें बसे बुजुर्गों की पीड़ा समाज के उस कड़वे सच को उजागर करती है जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।
आज हम बड़े श्रद्धाभाव से गाते हैं –
“राम आयेंगे तो अंगना सजायेंगे”,
लेकिन क्या कभी सोचा है कि जिन बुजुर्गों के आंगन में राम को लाने की उम्मीद थी, उन्हें अपने ही बच्चों ने वृद्धाश्रम की दहलीज पर छोड़ दिया है?
जब ‘राम’ प्रतीक्षा में हैं, लेकिन ‘श्रवण’ अनुपस्थित
राम का आदर्श जीवन पिता की आज्ञा के पालन पर टिका था। उन्होंने वनवास स्वीकार किया, लेकिन पिता की भावनाओं से विमुख नहीं हुए।
और आज?
राम के नाम पर भजन गाने वाले समाज में पिता की उपेक्षा, माता के आँसू और परिवार की विखंडित तस्वीर आम हो गई है।
आधुनिकता बनाम मूल्य
जहाँ एक ओर हम डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत और चाँद की ओर बढ़ते कदम की बात करते हैं, वहीं पारिवारिक संबंधों में खोखलापन और संवेदनहीनता की दीवारें भी ऊँची होती जा रही हैं।
बुजुर्गों को “बोझ” समझकर वृद्धाश्रम भेज देना क्या हमारी प्रगति का प्रमाण है?
“रामराज्य” की कल्पना, लेकिन “राम जैसा आचरण” नहीं
हम विश्व को अपनी संस्कृति, परिवार और आदर्शों का पाठ पढ़ाते हैं, लेकिन घर के भीतर माता-पिता उपेक्षित और अकेले हैं।
सच्चाई यह है कि राम आने से पहले, हमें राम जैसा पुत्र बनना होगा।
वरना यह विडंबना ही रह जाएगी कि
“राम के भजन गूंजते रहेंगे, लेकिन हमारे बुजुर्ग आँसू बहाते रहेंगे।”
क्या करें?
संस्कारों को जीना होगा, सिर्फ गाना नहीं।
बुजुर्गों को सम्मान देना होगा, सहानुभूति नहीं।
घर के आंगन को सजाना होगा, वृद्धाश्रम को नहीं।
रामराज्य की कल्पना से पहले राम जैसे व्यवहार को अपनाना होगा।
अगर हम सच में चाहते हैं कि राम आयें,
तो पहले घर में राम के लिए स्थान बनाना होगा,
जिसका पहला कदम है – माता-पिता को सम्मान और अपनापन देना।
वरना आने वाले समय में वृद्धाश्रम ही हमारे समाज की सबसे बड़ी विडंबना और सबसे शर्मनाक ‘सजावट’ बनते जाएंगे।
