“दूध और कोल्डड्रिंक : सेहत, समाज और समझ का सवाल”

  • संवाददाता – मनोज कुमार यादव

जब किसान का पोषण से भरपूर दूध 50 रुपए लीटर बिकता है और उसी मूल्य पर व्यापारी की सेहत के लिए हानिकारक कोल्डड्रिंक मिलती है, तो यह समाज की प्राथमिकताओं और सोच पर एक गंभीर प्रश्नचिन्ह है।

दूध वह सम्पूर्ण आहार है जो गांव के खेतों और पशुपालन से जुड़ी मेहनत का नतीजा है। इसमें प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन और जीवन देने वाली ऊर्जा होती है। दूध बच्चों, बुजुर्गों, बीमारों और स्वस्थ लोगों के लिए समान रूप से लाभकारी है। इसके पीछे किसान की दिन-रात की मेहनत और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग होता है।

वहीं, कोल्डड्रिंक एक ऐसा पेय है जिसमें न पोषण है, न स्वास्थ्य का योगदान। यह कृत्रिम स्वाद, रंग और अत्यधिक शर्करा से भरी होती है। इससे मोटापा, डायबिटीज, दांतों की सड़न और पाचन से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। इसके बावजूद शहरों में युवा वर्ग इसके प्रति आकर्षित है, और दुकानों पर यह दूध से ज्यादा आसानी से उपलब्ध है।

विडंबना यह है कि किसान की मेहनत का फल – दूध – उतना सम्मान और मूल्य नहीं पाता, जितना चमकदार बोतल में बंद एक ब्रांडेड कोल्डड्रिंक। यह स्थिति हमारे उपभोग के विकल्पों की समझ की कमी को दर्शाती है।

समाज को यह विचार करना होगा कि हम किस ओर जा रहे हैं — स्वस्थ जीवन की दिशा में या रोगों की ओर? हमें यह तय करना होगा कि हम अपनी अगली पीढ़ी को दूध की ताकत देना चाहते हैं या कोल्डड्रिंक की लत।

यदि किसान को प्रोत्साहित करना है, तो उसके उत्पादों – जैसे दूध – को प्राथमिकता देना होगी। बाजार की चकाचौंध में स्वास्थ्य और खेती की नींव को नजरअंदाज़ करना हमारे भविष्य के लिए घातक हो सकता है। अब समय है सोच बदलने का – दूध को जीवन का मूल और कोल्डड्रिंक को विकल्प से बाहर करने का।

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