उरूज शम्सी – बांसुरी के शहर से उठती हौसले की सदा
ज़िन्दगी में बाज़ औक़ात ऐसे मोड़ आते हैं के इंसान बिखरने लगता है , ख़्वाब अधूरे रह जाते हैं और रास्ते धुंधला जाते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो उन्हीं अंधेरी गलियों में अपने लिए चराग़ जला लेते हैं आज हम एक ऐसी ही बहिम्मत और बवाक़ार खातून की कहानी पेश कर रहे है जिन्होंने ना सिर्फ़ अपनी जिंदगी को सवारा, बल्कि हज़ारों औरतों के लिए हौसले और खुद्दारी की एक रौशन मिसाल क़याम की
हम बात कर रहे है उरूज शम्सी की , जिन का जन्म पीलीभीत के मशहूर इलमी घराने में हुआ वही पीलीभीत जो बांसुरी के नग़्मो, कुदरती फ़िज़ा, और सकाफ़त के रस के लिए जाने जाता है
“पीलीभीत की बेटी हौसले का चेहरा”
उरूज बचपन से ही खुद्दार , मेहनती और हसास मिजाज़ की लड़की थी, हालात ने जब इम्तिहान लिया तो वो ख़ामोश ना हुई , बल्कि वक़्त को आवाज़ देने का हुनर सिखा शादी के कुछ अर्से बाद जिंदगी में वो लम्हा आया जो किसी भी औरत के लिए निहायत मुश्किल होता है – तलाक़
ये वो मक़ाम था जहां कई लोग ठहर जाते हैं, मगर उरूज ने हार नहीं मानी उन्होंने आंखों के ख्वाबों को टूटने ना दिया एक नई सुबह एक नई उम्मीद के साथ उन्होंने ” चटखट अचार ” के नाम से अपना जाति कारोबार शुरू किया
” चटखट अचार – सिर्फ़ ज़ायके नहीं , हौसले का तड़का “
इस कोरबार की बुनियाद सिर्फ़ मसाले और तरकारी नहीं थे, बल्कि उरूज की मेहनत , जद्दोजहद और खुद पर यक़ीन इस का असल जज्ब थे आम, लिम्मू, गाजर, मिर्च , लहसुन, के अचार हर जार में उन के ख़्वाब बंद हैं , हर डब्बा उन की कहानी सुनाता है
जो लोग हालात से लड़ना जानते हैं
वो खामोशियों में भी इंकलाब लिख देते हैं
उरूज शम्सी ने अपने हुनर से साबित कर दिया के औरत सिर्फ़ घर तक मेहदूद नहीं , वो चाहें तो दुनिया की हर दीवार को उबूर कर सकती है उन्होंने सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया , मकामी मेलों में स्टॉल लगाया, और आहिस्ता आहिस्ता “चटखट अचार ” को ना सिर्फ़ पीलीभीत बल्कि पूरे मुल्क में मकबूल बना दिया
“एक खातून एक कारोबार”
अकेले चलने वाली औरत जब वक़्त से आगे बढ़ती है ,
तो दुनिया उसे कहती है वो कहानी है वो मिसाली है
उरूज की ये काबिश सिर्फ़ एक कामयाब कारोबार नहीं बल्कि एक तहरीर है – आज वो दीगर तलाक़ याफ़्ता और मजबूर औरतों के लिए एक उम्मीद की किरन हैं वो अक्सर कहती हैं
जो रिश्ते टूट गये, उन से दिल नहीं , हौसला निकालो
जो आंख नम हुई , उसे ख्वाबों से सजा लो
” उरूज शम्सी – नाम नहीं, पैग़ाम है “
पीलीभीत की सरजमीं पर जन्म लेने वाली उरूज उस धरती का फख्र हैं उन के जज़्बे को अल्फ़ाज़ में क़ैद करना मुश्किल है , मगर कुछ अशआर उन के लिए मुनासिब हैं
मै लड़खड़ाई ज़रूर थी मगर गिरी नहीं
तूफ़ान आया कई बार , मगर डरी नहीं
मेरे हाथ में कुछ ख़्वाब थे और दिल में यक़ीन
यही सरमाया था , इसी से मैं मरी नहीं
हर जार में है कहानी मेरी,
हर ज़ायके में जुबानी मेरी
चटखट अचार है सिर्फ़ नमक मिर्च नहीं,
ये मेहनत है , जुनून है , निशानी मेरी
उरूज शम्सी की कहानी हमें ये सिखाती है के
तलाक़ नहीं,इख़्तिताम एक नया आगाज़ भी हो सकता है
औरत अगर चाहे तो तन्हा भी दुनिया का नक्शा बदल सकती है
छोटे शहर , बड़े ख्वाबों को जन्म दे सकती है
अगर आप के दिल में कुछ टूटा है तो उसे बिखरने न दें , उसे अपनी पहचान बनाए जैसे उरूज शम्सी ने किया
अकबर सरफ़राज़
