कांग्रेस द्वारा लगाए गए आपातकाल को यह देश कभी भूल नहीं सकता : अशोक कटारिया
देश का सबसे काला अध्याय आपातकाल: अशोक कटारिया
आज रामपुर जनपद में आयोजित प्रेस वार्ता को संबोधित करने, उत्तर प्रदेश सरकार में पूर्व राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार (सदस्य विधान परिषद) अशोक कटारिया, जिला सहकारी बैंक, रामपुर के सभागार गृह पहुंचे, और उपस्थित प्रेस के बंधुओ को संबोधित किया।।
प्रेस वार्ता में पूर्व राज्य मंत्री शिव बहादुर सक्सेना, जिला प्रभारी चौधरी राजा वर्मा, पिछड़ा राज आयोग के उपाध्यक्ष सूर्य प्रकाश पाल, जिला अध्यक्ष हरीश गंगवार, जिला पंचायत अध्यक्ष ख्यालीराम लोधी, जिला सहकारी बैंक अध्यक्ष मोहनलाल सैनी, जिला मीडिया प्रभारी अर्जुन रस्तोगी, नगर पालिका अध्यक्ष चित्रक मित्तल, ब्लॉक प्रमुख जगपाल यादव, कुलवंत औलख, यूसुफ अली, मोहित सैनी, आदि जन प्रतिनिधि और पदाधिकारी मौजूद रहे।।
अशोक कटारिया ने प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए कहा, 25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘आंतरिक अशांति’ का बहाना बनाकर भारत पर आपातकाल थोप दिया। यह निर्णय किसी युद्ध या विद्रोह के कारण नहीं, बल्कि अपने चुनाव को रद्द किए जाने और सत्ता बचाने की हताशा में लिया गया था। कांग्रेस पार्टी ने इस काले अध्याय में न केवल लोकतांत्रिक संस्थाओं को रौंदा, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की निष्पक्षता और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कुचलकर यह स्पष्ट कर दिया कि जब-जब उनकी सत्ता संकट में होती है, वे संविधान और देश की आत्मा को ताक पर रखने से पीछे नहीं हटते। आज 50 वर्ष बाद भी कांग्रेस उसी मानसिकता के साथ चल रही है, आज भी सिर्फ तरीकों का बदलाव हुआ है, नीयत आज भी वैसी ही तानाशाही वाली है।
मार्च 1971 में लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत से जीतने के बावजूद इंदिरा गांधी की वैधानिकता को चुनौती मिली। उनके विपक्षी उम्मीदवार राज नारायण ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनाव को भ्रष्ट आचरण और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के आधार पर चुनौती दी। देश की अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही थी, जिससे जनता में असंतोष बढ़ता जा रहा था। देश पहले से ही आर्थिक बदहाली, महंगाई और खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। बिहार और गुजरात में छात्रों के नेतृत्व में नव निर्माण आंदोलन खड़ा हो चुका था। 8 मई 1974 को जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में ऐतिहासिक रेल हड़ताल ने पूरे देश को जकड़ लिया। इस आंदोलन को रोकने के लिए 1974 में गुजरात में इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति शासन लगा दिया। यही राष्ट्रपति शासन 1975 में लगने वाले आपातकाल की एक शुरुआत था।
इसके साथ ही बिहार में कांग्रेस सरकार के खिलाफ असंतोष बढ़ने लगा और 1975 में हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। 12 जून 1975 को कोर्ट ने इंदिरा गांधी को चुनाव में दोषी ठहराया और उन्हें 6 वर्षों तक किसी भी निर्वाचित पद पर रहने से अयोग्य करार दिया। इसके बाद राजनीतिक अस्थिरता तेजी से बढ़ी, जिससे घबराकर इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को ‘आंतरिक अशांति’ का हवाला देकर राष्ट्रपति से आपातकाल लगा दिया। रातोंरात प्रेस की बिजली काटी गई, नेताओं को बंदी बनाया गया और 26 जून की सुबह देश को तानाशाही की सूचना रेडियो के माध्यम से दी गई। संविधान के अनुच्छेद 352 का दुरुपयोग कर लोकतंत्र को रौंदा गया, संसद और न्यायपालिका को अपंग बना दिया गया। यह सिलसिला किसी युद्ध या बाहरी हमले से नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के कुर्सी खोने होने के भय से शुरू हुआ और पूरे राष्ट्र को मौलिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया।
1. 1975 में आपातकाल की घोषणा कोई राष्ट्रीय संकट का नतीजा नहीं थी, बल्कि यह एक डरी हुई प्रधानमंत्री की सत्ता बचाने की रणनीति थी, जिसे न्यायपालिका से मिली चुनौती से बौखला कर थोपा गया।
2. इंदिरा गांधी ने ‘आंतरिक अशांति’ की आड़ लेकर अनुच्छेद 352 का दुरुपयोग किया, जबकि न उस समय कोई युद्ध की स्थिति थी, न विद्रोह और न ही कोई बाहरी आक्रमण हुआ, यह सिर्फ इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा इंदिरा की चुनावी सदस्यता रद्द करने के निर्णय को निष्क्रिय करने और अपनी कुर्सी को बचाने की जिद थी।
3. जिस संविधान की शपथ लेकर इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी थीं, उसी संविधान की आत्मा को कुचलते हुए उन्होंने लोकतंत्र को एक झटके में तानाशाही में बदल दिया और चुनाव में दोषी ठहराए जाने के बाद नैतिकता से इस्तीफा देने के बजाय पूरी व्यवस्था को ही कठपुतली बनाकर रखने का षड्यंत्र रच दिया।
4. कांग्रेस सरकार ने कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका सहित लोकतंत्र के तीनों स्तंभों को बंधक बनाकर सत्ता के आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। प्रेस की स्वतंत्रता पर ऐसा हमला हुआ कि बड़े-बड़े अखबारों की बिजली काट दी गई, सेंसरशिप लगाई गई और पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया।
5. आज भी कांग्रेस शासित राज्यों में कानून व्यवस्था का हाल यह है कि वहां विरोध का दमन, धार्मिक तुष्टीकरण और सत्ता का अहंकार खुलेआम दिखता है। यह सब आपातकालीन सोच की ही उपज है।
6. ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा’ जैसे नारे कांग्रेस की उस मानसिकता को दर्शाते थे जिसके तहत इंदिरा गांधी ने देश को व्यक्ति-पूजा और परिवारवाद की प्रयोगशाला बना दिया था।
7. आपातकाल के दौरान एक परिवार को संविधान से ऊपर रखने वाली कांग्रेस आज भी ‘राहुल-प्रियंका’ के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है और सत्ता की चाबी अब भी सिर्फ खानदानी जेब में रखी जाती है। विपक्षी गठबंधन की बैठकें आज भी कांग्रेस अध्यक्ष के घर होती हैं और यह बताने के लिए काफी है कि ‘तंत्र’ आज भी परिवार के चरणों में समर्पित है।
8. लोकतंत्र पर हुए आघात पर एक बड़ी चोट संजय गांधी का नीतियों पर निर्णय लेना भी था। एक निर्वाचित और किसी भी संवैधानिक पद पर न रहा व्यक्ति देश की नीतियों पर निर्णय लेने लगा, जो आपातकाल में कांग्रेस की अघोषित सत्ता का असली केंद्र बन चुका था।
9. इंदिरा गांधी ने मीसा जैसे काले कानूनों के जरिए एक लाख से अधिक नागरिकों को बिना किसी मुकदमे के जेलों में ठूंस दिया, जिनमें श्री जयप्रकाश नारायण, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री लाल कृष्ण आडवाणी, श्री मुरली मनोहर जोशी और श्री राजनाथ सिंह सहित तमाम वरिष्ठ विपक्षी नेता, पत्रकार तो शामिल थे ही, लेकिन कांग्रेस शासन ने छात्रों तक को जेल में सड़ने पर मजबूर कर दिया था।
10. आपाताकाल के इस काले दौर में कांग्रेस ने न्यायपालिका पर कभी न भरने वाले घाव किए। इंदिरा गांधी ने जस्टिस एच.आर. खन्ना जैसे ईमानदार जज को सीनियर होने के बावजूद मुख्य न्यायाधीश नहीं बनाया, क्योंकि उन्होंने सरकार के खिलाफ फैसला सुनाया था।
11. इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता को महफूज रखने के लिए संविधान में 39वां और 42वां जैसा क्रूर और अलोकतांत्रिक संशोधन किया जिसके तहत प्रधानमंत्री और अन्य शीर्ष पदों को न्यायिक समीक्षा से परे कर दिया, ताकि इंदिरा गांधी को अदालत में घसीटा न जा सके।
12. प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी उस समय साधारण कार्यकर्ता हुआ करते थे और उनके जैसे लाखों समर्पित स्वयंसेवकों ने रातों-रात रेलों में पर्चे बांटे, संदेश पहुंचाए और कांग्रेस की सच्चाई हर गांव और गली तक पहुंचाई। कांग्रेस की तानाशाही का विरोध केवल राजनीतिक नहीं था, यह भारत की आत्मा की रक्षा का आंदोलन था जिसमें राष्ट्रवादियों ने जान की बाजी लगाई।
13. कांग्रेस ने लोकतंत्र के साथ इतना बड़ा विश्वासघात किया लेकिन आज भी वह अपने किए के लिए न तो माफी मांगती है और न ही पछतावा प्रकट करती है। आज ‘संविधान बचाओ’ का नारा देने वाली कांग्रेस वही पार्टी है जिसने संविधान को सबसे पहले और सबसे गहराई से रौंदा था।
14. इंदिरा गांधी की तानाशाही का सबसे भयावह चेहरा यह था कि उन्होंने अपने पुत्र के माध्यम से सत्ता को वंशवाद की जकड़ में पूरी तरह कैद कर लिया और सत्ता की लोलुपता में कांग्रेस ने लोकसभा का कार्यकाल 5 से बढ़ाकर 6 साल कर दिया, ताकि जनता को मतदान का अवसर न मिले।
15. आपातकाल गांधी परिवार की उस सोच का परिचायक था, जिसमें स्पष्ट हो गया था कि उनके लिए पार्टी और सत्ता परिवार के लिए होती है, देश और संविधान के लिए नहीं। आजादी के बाद देश में पहली बार ऐसा हुआ था कि सरकार ने राष्ट्र को शत्रु नहीं, बल्कि अपनी जनता को ही बंदी बना लिया था।
16. आज कांग्रेस में चेहरे बदल गए हैं, लेकिन तानाशाही की प्रवृत्ति और सत्ता का लोभ जस का तस है। 50 वर्ष बाद आज आपातकाल को याद करना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि यह इतिहास की एक घटना मात्र नहीं बल्कि कांग्रेस की मानसिकता का प्रमाण भी है।
17. इंदिरा गांधी की यही तानाशाही मानसिकता आज के कांग्रेस नेतृत्व में दिखाई देती है। आज भी कांग्रेस शासित राज्यों में पत्रकारों पर मुकदमे होते हैं, सोशल मीडिया पोस्ट पर गिरफ्तारी हो जाती है और एक्टिविस्टों पर पुलिस कार्रवाई होती है।
18.2024 लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने बाकायदा बहिष्कृत पत्रकारों की लिस्ट जारी की थी जिनकी डिबेट में जाने से कांग्रेस प्रवक्ताओं को मना किया गया था। जहां एक ओर तो ये अपने शासन में पत्रकारों पर मुकदमे करते हैं वहीं दूसरी विपक्ष में होने पर उनका बहिष्कार कर देते हैं।
19. सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार फैलाना और देश की छवि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खराब करना कांग्रेस की नई ‘डिजिटल इमरजेंसी’ रणनीति बन चुकी है। जब देश हर मोर्चे पर प्रगति कर रहा है, तब कांग्रेस सरकार की हर उपलब्धि को झुठलाने में लगी है, यह वही नकारात्मक मानसिकता है जिसने 1975 में देश को पीछे खींचा था।
20. देश की सुरक्षा, सैन्य कार्रवाई या विदेश नीति पर कांग्रेस जिस तरह सेना पर सवाल उठाती है, वह केवल राजनीतिक अवसरवाद नहीं, बल्कि राष्ट्रहित के विरुद्ध तर्कहीन विरोध है।
