
✍️संतोष देव गिरि
वंशवाद और जातिवाद का मेल कई क्षेत्रीय और कुछ राष्ट्रीय दलों की रणनीति का केंद्र रहा है। यह देखा गया है कि ये दल जातीय समीकरणों का इस्तेमाल कर केवल सत्ता में आने का जरिया बनाते हैं, लेकिन जब प्रतिनिधित्व की बात आती है तो फैसले लेने की ताकत कुछ खास परिवारों तक ही सीमित रहती है। यह कथन भारतीय राजनीति की एक कटु सच्चाई को उजागर भी करता है।
जाति-आधारित समर्थन को केवल वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करना, समाज में वास्तविक समानता और समावेश की भावना को नुकसान पहुंचाता है।
यह कड़वी सच्चाई भी है कि अपनी जातियों के बल पर राजनीति करने वाले परिवारवादी दलों के लिए उनकी जातियां केवल मोलभाव के लिए हैं जिनके बल पर वह केवल अपने और अपने परिवार के सदस्यों को राजनीति में स्थापित करते हैं। नज़ीर के तौर पर मौजूदा केन्द्र और राज्य सरकार के गठबंधन दलों को ही देखें जो जाति की बात तो करते ही हैं लेकिन जब बारी आती है शीर्ष पर स्थापित होने को तो उन्हें परिवारवाद से बेहतर कुछ और नहीं सूझता है। यूपी की सत्रा से लेकर केन्द्र की सत्ता में सत्ता सुख भोगते आएं एक दल की बात करें तो कही इसी दल की मुखिया पूर्व की सत्ता में बने दल के मुखिया और उनकी पार्टी पर परिवारवाद का तोहमत मढ़ते हुए चीख चीख कर शब्दबाण छोड़ती रहीं हैं, लेकिन कालांतर में वह खुद ही परिवार से बुरी तरह से घिरी हुई है। ख़ुद उनपर और उनकी पार्टी पर ‘पति-पत्नी की पार्टी’ होने का आरोप लगते आएं हैं।
भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन इसमें कुछ ऐसी संरचनात्मक कमज़ोरियां हैं जो इसकी जड़ों को कमजोर करती हैं। उनमें से दो प्रमुख समस्याएं हैं ‘जातिवाद और परिवारवाद’ और जब ये दोनों एक साथ जुड़ते हैं, तो राजनीति केवल सत्ता का खेल बनकर रह जाती है, जनता की सेवा का माध्यम नहीं।
दरअसल, जाति एक सामाजिक व्यवस्था थी, जो अब राजनीतिक अस्त्र बन चुकी है। अनेक राजनीतिक दल जातिगत आधार पर टिकट बांटते हैं, सरकार बनाते हैं और गठबंधन तय करते हैं। इसके पीछे तर्क यह होता है कि कोई खास जाति उनके ‘कोर वोटर’ हैं। इस रणनीति का उपयोग कर नेता सत्ता तक तो पहुंचते हैं, लेकिन उस जाति के सामान्य लोगों को इससे क्या लाभ होता है यह एक बड़ा सवाल है। राजनीतिक दलों के लिए जातियां एक मोलभाव का उपकरण बन गई हैं। वे चुनाव से पहले अपने भाषणों में जातियों का खूब सम्मान करते हैं, उनके नेताओं को महत्व देते हैं, और भावनात्मक अपील करते हैं। लेकिन चुनाव जीतने के बाद वही जातियां हाशिए पर चली जाती हैं, और सत्ता में भागीदारी केवल खास परिवारों तक सिमट जाती है। ऐसे में एक सवाल उत्पन्न होता है कि सत्ता में जाति आधारित व्यवस्था तो बंद ही होनी चाहिए, क्यों जातियों के नाम पर सत्ता की कुर्सी हासिल करते ही यह उन जातियों को भूल सिर्फ और सिर्फ परिवारवाद की चादर तान लेते हैं। बात जब होती है जाति की तो सबसे पहले दलित-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों पर देश की राजनीति और विभिन्न दलों खासकर, जो जाति की राजनीति पर जीवित होते हुए आएं हैं उनकी राजनीतिक में जाति का तड़का तगड़ा होता है, लेकिन सत्ता और सदन की कुर्सी पर बिराजते ही सर्वप्रथम यह अपनी झोली को भरते हुए अपनी ग़रीबी को दूर करने में जुट जाते हैं। इस बात को तमाम उन छोटे दलों को लेते हुए देखा जा सकता है जो कभी अपने वजूद को बचाने की जद्दोजहद करते हुए आएं हैं और आज सत्ता सुख भोगते हुए ख़ुद परिवारवाद के बड़े उदाहरण बनें हुए हैं।
भारत में कई दल ऐसे हैं जो पूरी तरह से एक ही परिवार के नियंत्रण में हैं। चाहे वह टिकट का बंटवारा हो, पार्टी के पदों की नियुक्ति हो या नीति-निर्धारण सभी में एक ही परिवार के लोग निर्णायक होते हैं। यह लोकतंत्र की आत्मा के विरुद्ध है। इसमें न तो प्रतिभा की कद्र होती है, न जनप्रतिनिधियों की स्वतंत्रता।
गौर करें तो जब कोई दल किसी जाति के नाम पर राजनीति करता है, तो वह उस समुदाय की भावनाओं से खेलता है। उसे लगता है कि वह जाति हमेशा उनका समर्थन करेगी, भले ही उनके जीवन में कोई सुधार न हो। यह एक प्रकार की भावनात्मक धोखाधड़ी है। ऐसे में जनता को यह समझने की ज़रूरत है कि राजनीति में योग्यता और नीतियों के आधार पर निर्णय होने चाहिए, न कि केवल जाति या खानदान के नाम पर। एक बात यह भी है राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र हो ताकि टिकट वितरण पारदर्शी और निष्पक्ष हो। दूसरे शिक्षा और सामाजिक सुधार के नज़रिए से देखा जाए तो जातिगत पहचान से ऊपर उठकर सोचने के लिए शिक्षा सबसे प्रभावी माध्यम है। जब तक राजनीति जाति और परिवार की गिरफ्त में रहेगी, तब तक जनहित की नीतियां केवल भाषणों तक सीमित रहेंगी। असली बदलाव तब आएगा जब आम नागरिक अपने वोट की ताकत को समझेगा और जाति या वंश नहीं, बल्कि कर्म और नीयत के आधार पर अपने प्रतिनिधि चुनेगा।
संतोष देव गिरि
(स्वतंत्र लेखक/पत्रकार)
9455320722
