नई दिल्ली। भारत के पहले ‘सोलर मिशन’ आदित्य-एल1 ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। इस मिशन के जरिए वैज्ञानिकों को शक्तिशाली सौर तूफानों की प्रकृति और उनके पृथ्वी तक पहुंचने के दौरान होने वाले बदलावों को समझने में बड़ी मदद मिली है। यह खोज न केवल वैश्विक अंतरिक्ष विज्ञान के लिए अहम है, बल्कि भारत के बढ़ते वैज्ञानिक नेतृत्व को भी दर्शाती है।
नए साल 2026 में आदित्य-एल1 से और भी अहम जानकारियां मिलने की उम्मीद है, क्योंकि यह सूर्य के सबसे सक्रिय चरण ‘सोलर मैक्सिमम’ का अध्ययन कर रहा है। नासा के अनुसार सूर्य इस समय सोलर मैक्सिमम में प्रवेश कर चुका है, जब उसकी चुंबकीय गतिविधियां अत्यधिक बढ़ जाती हैं। लगभग हर 11 साल में आने वाले इस चरण के दौरान सूर्य पर तीव्र विस्फोट और सौर तूफान देखने को मिलते हैं।
मई 2024 में आदित्य-एल1 ने पिछले दो दशकों के सबसे प्रबल सौर तूफान का सामना किया, जिसे ‘गैनन तूफान’ कहा गया। यह तूफान सूर्य पर हुए विशाल विस्फोटों यानी प्रभामंडलीय द्रव्यमान उत्सर्जन (सीएमई) की श्रृंखला से बना था। सीएमई सूर्य से निकलने वाली गर्म गैस और चुंबकीय ऊर्जा का विशाल बुलबुला होता है, जो पृथ्वी से टकराने पर उपग्रहों, संचार प्रणालियों, जीपीएस और बिजली ग्रिड को प्रभावित कर सकता है।
इस सौर तूफान के दौरान वैज्ञानिकों ने एक असामान्य घटना देखी। उन्होंने पाया कि सौर तूफान के भीतर मौजूद चुंबकीय क्षेत्र टूटकर दोबारा जुड़ रहे थे। आदित्य-एल1 से मिले सटीक चुंबकीय मापों के कारण वैज्ञानिक पहली बार सीएमई के भीतर इस पुनर्संयोजन प्रक्रिया का विस्तृत मानचित्र तैयार कर सके।
अध्ययन में सामने आया कि जिस क्षेत्र में चुंबकीय क्षेत्र टूटकर फिर से जुड़ रहा था, उसका आकार लगभग 13 लाख किलोमीटर था, जो पृथ्वी के आकार से करीब 100 गुना बड़ा है। यह पहली बार है जब किसी सीएमई के अंदर इतने बड़े पैमाने पर चुंबकीय विखंडन और पुनर्संयोजन को प्रत्यक्ष रूप से दर्ज किया गया है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज सौर तूफानों के विकास और उनके प्रभावों को समझने में मील का पत्थर साबित होगी। इससे भविष्य में सौर तूफानों की सटीक भविष्यवाणी संभव हो सकेगी और पृथ्वी पर मौजूद तकनीकी ढांचे को समय रहते सुरक्षित किया जा सकेगा।
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