गुस्ताखी माफ हरियाणा – पवन कुमार बंसल
हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी बंसीलाल की धर्मपत्नी बेहद सीधी-साधी और सादगी पसंद महिला थीं। पति के मुख्यमंत्री होने के बावजूद वे तामझाम और सरकारी आडंबर से दूर रहती थीं तथा राजकीय कार्यक्रमों में बहुत कम ही जाती थीं।
एक बार राजकीय महाविद्यालय भिवानी के प्रिंसिपल ने उन्हें एक कार्यक्रम की अध्यक्षता के लिए आमंत्रित कर लिया। कार्यक्रम के दौरान प्रिंसिपल परंपरा के अनुसार बार-बार यह कह रहे थे कि “मैडम ने अपनी व्यस्तता के बावजूद समय निकाला, इसके लिए हम आभारी हैं।”
उस कार्यक्रम में उनकी बेटी सरोज और पुत्रवधु किरण चौधरी भी साथ थीं। मैडम ने सरोज से पूछा कि प्रिंसिपल क्या कह रहे हैं। सरोज ने सरल शब्दों में समझाया कि वे कह रहे हैं आप घर के कामों में बहुत व्यस्त रहती हैं, फिर भी समय निकालकर आई हैं। मैडम ने इसे यह समझ लिया कि प्रिंसिपल कह रहे हैं कि वह सारा दिन घर का काम करती हैं।
प्रिंसिपल अभी बोल ही रहे थे कि मैडम ने माइक लेकर स्पष्ट कहा, “मैं तो बिल्कुल खाली रहती हूं, घर का सारा काम तो बहू किरण करती है। मेरा कोई व्यस्त समय नहीं है।” यह सुनकर प्रिंसिपल महोदय के होश उड़ गए, लेकिन स्थिति स्पष्ट होने पर उन्होंने राहत की सांस ली।
एक अन्य अवसर पर उन्हें एक संस्कृत कार्यक्रम में बुलाया गया। वहां प्रस्तुत हरियाणवी नृत्य उन्हें पसंद नहीं आया और उन्होंने मंच से ही अपनी नाराज़गी जता दी। बताया जाता है कि उसके बाद आयोजकों ने ऐसे कार्यक्रमों को लेकर अधिक सावधानी बरती।
उनकी पारिवारिक सादगी और संस्कारों का उल्लेख आईएएस अधिकारी आर.एस. वर्मा ने भी किया। वे बताते हैं कि बंसीलाल के बेटे की शादी में जब वे अपनी पत्नी के साथ पहुंचे तो उनकी पत्नी ने अपेक्षाकृत कम आभूषण पहने थे। इस पर मैडम ने सहज अंदाज में कहा, “क्या नंगी-बूच्ची आई थी?” मैडम वर्मा पहले तो चौंक गईं, लेकिन उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब मैडम बंसीलाल ने स्नेहपूर्वक उन्हें सोने की चेन पहनने के लिए दे दी।
ऐसे कई प्रसंग उनकी सरलता, स्पष्टवादिता और पारिवारिक संस्कारों की झलक आज भी लोगों को मुस्कुराने पर मजबूर कर देते हैं।
