- रिपोर्ट – मनोज कुमार यादव
एटा :- जनपद एटा के गांव छछैना विकास खण्ड सकीट में अंग्रेजी हुकूमत के समय बनी पनचक्की (जल चक्की) आज भी बीते दौर की यादों को संजोए खड़ी है। कभी यह पनचक्की ग्रामीण जीवन की धड़कन थी, जहां गेहूं, मक्का और अन्य अनाज बिना किसी ईंधन के, केवल पानी के बहाव से पिसा करते थे। यह तकनीक न केवल पर्यावरण के लिए अनुकूल थी, बल्कि ग्रामीणों की आर्थिक मजबूती का भी आधार थी।
लेकिन अफसोस, यह ऐतिहासिक धरोहर अब शासन और प्रशासन की लापरवाही का शिकार होकर धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खो रही है। वर्षों से इसकी मरम्मत और रखरखाव के अभाव में पनचक्की जर्जर हो चुकी है। पानी का बहाव मार्ग टूट चुका है, पंखे और पाटे जंग खा रहे हैं और पूरी संरचना पर समय की मार साफ नजर आ रही है।
क्षेत्र के जागरूक नागरिक, समाजसेवी और स्थानीय ग्रामीण पनचक्की को पुनः चालू कराने के लिए विभागीय अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर लगा लगा कर थक चुके हैं। लोगों का कहना है कि यदि इस धरोहर को फिर से जीवित कर दिया जाए, तो यह न केवल पर्यावरण-संरक्षण और ग्रामीण विकास का प्रतीक बनेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी इतिहास से जोड़ने का काम करेगी।
फिलहाल, अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर लगाते समाजसेवियों की उम्मीदें अब भी कायम हैं, लेकिन समय बीतने के साथ यह सवाल और गहरा होता जा रहा है—क्या हमारी ऐतिहासिक विरासत को बचाने के लिए केवल कागजी कार्यवाही और आश्वासन ही काफी हैं, या फिर वास्तविक कार्यवाही होगी?
अगर अभी कदम नहीं उठाए गए तो एटा की ही नहीं बल्कि हमारे देश की लगभग 125 साल पुरानी यह अनमोल धरोहर (पनचक्की) आने वाले समय में केवल तस्वीरों और यादों तक सिमटकर रह जाएगी।
शासन और प्रशासनिक अधिकारियों को जागना होगा इस पनचक्की का जीर्णोद्धार कर इसे पर्यटन और स्थानीय विकास का केंद्र बनाया जाये, ताकि यह सिर्फ इतिहास की धरोहर न रहकर भविष्य की प्रेरणा भी बन सके।
