UPI-MDR: यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच राजनीतिक विवाद बढ़ गया है। सरकार की ओर से दावा किया गया है कि संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति ने UPI के लिए एक स्तरीय यानी टियर-बेस्ड MDR या रेवेन्यू मॉडल की जरूरत पर जोर दिया था और अगस्त में रिपोर्ट को अपनाए जाने के दौरान समिति में शामिल कांग्रेस सांसदों ने कोई औपचारिक असहमति दर्ज नहीं कराई थी। दूसरी ओर, कांग्रेस सांसदों ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि सरकार की ओर से अब जिस खास MDR व्यवस्था की बात की जा रही है, उसका कोई विशिष्ट प्रस्ताव समिति के सामने रखा ही नहीं गया था।
इस विवाद के केंद्र में संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की 44वीं एक्शन टेकन रिपोर्ट है। सरकारी सूत्र इसी रिपोर्ट का हवाला देते हुए कह रहे हैं कि समिति ने UPI के लिए टिकाऊ रेवेन्यू मॉडल विकसित करने और टियर-बेस्ड MDR व्यवस्था को जल्द लागू करने की जरूरत बताई थी। वहीं विपक्षी सांसदों का कहना है कि समिति की सामान्य सिफारिश और अब सरकार की ओर से घोषित विशिष्ट MDR व्यवस्था को एक ही चीज मानना सही नहीं है।
सरकार का क्या है दावा?
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति ने UPI के मौजूदा जीरो-MDR मॉडल की वित्तीय स्थिरता को लेकर चिंता जताई थी। समिति ने एक ऐसे रेवेन्यू मॉडल की जरूरत बताई, जिससे डिजिटल पेमेंट सिस्टम के संचालन, साइबर सुरक्षा, फ्रॉड रोकथाम और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी जरूरतों के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हो सकें।
सरकार का कहना है कि समिति की 44वीं रिपोर्ट में टियर-बेस्ड MDR को लेकर आगे बढ़ने की बात कही गई थी। रिपोर्ट को 12 अगस्त को अपनाए जाने के समय कांग्रेस के पांच सांसद—पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी, गौरव गोगोई, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ—समिति की बैठक में मौजूद थे। सरकारी सूत्रों के अनुसार प्रकाशित कार्यवाही में इन सांसदों की ओर से कोई औपचारिक असहमति दर्ज नहीं की गई।
इसी आधार पर सरकार की ओर से कांग्रेस के मौजूदा विरोध पर सवाल उठाए गए हैं। सरकार का तर्क है कि समिति ने UPI के लिए लंबे समय तक चलने वाले रेवेन्यू मॉडल की आवश्यकता को स्वीकार किया था। हालांकि, यह दावा उस विशिष्ट MDR दर और शर्तों के समर्थन के बराबर है या नहीं, इसी मुद्दे पर अब कांग्रेस और सरकार के बीच मतभेद है।
कांग्रेस ने क्या कहा?
कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने सरकार के दावे को खारिज किया है। उनका कहना है कि संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति के सामने सरकार की ओर से हाल में घोषित किया गया विशिष्ट UPI शुल्क प्रस्ताव चर्चा के लिए नहीं रखा गया था।
गोगोई के मुताबिक, जब वित्तीय सेवा विभाग समिति के सामने आया था, उस समय उसके पास UPI पर लागू किए जाने वाले इस तरह के किसी खास शुल्क का प्रस्ताव नहीं था। उन्होंने कहा कि समिति की बैठकों में MDR की जरूरत को लेकर सवाल जरूर उठाए गए थे, लेकिन उस समय सरकारी प्रतिनिधियों की ओर से उन्हें कोई स्पष्ट या संतोषजनक जवाब नहीं मिला था।
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी गोगोई के बयान का समर्थन किया। उनका कहना है कि 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाली प्रस्तावित MDR व्यवस्था के संबंध में दर, शुल्क की रकम, अधिकतम सीमा और छूट की श्रेणियों जैसी विशिष्ट बातें समिति के सामने नहीं रखी गई थीं।
तिवारी ने यह भी कहा कि समिति की अलग-अलग बैठकों के दौरान MDR की जरूरत और उसकी उपयोगिता को लेकर सदस्यों ने सवाल उठाए थे। उनके अनुसार, समिति की गोपनीय कार्यवाही को आधार बनाकर यह कहना कि कुछ सांसदों ने मौजूदा सरकारी फैसले का समर्थन किया था, पूरी स्थिति को सही तरीके से पेश नहीं करता।
विवाद आखिर किस बात पर है?
पूरे मामले को समझने के लिए सरकार और विपक्ष के दावों के बीच अंतर देखना जरूरी है। सरकार जिस बात पर जोर दे रही है, वह समिति की व्यापक सिफारिश है। समिति ने UPI के लिए एक टिकाऊ और स्तरीय रेवेन्यू मॉडल की जरूरत का उल्लेख किया था।
वहीं कांग्रेस सांसदों का कहना है कि समिति के सामने जिस विशिष्ट MDR व्यवस्था की बात अब सरकार कर रही है, वह उस समय मौजूद ही नहीं थी। इसलिए उनका तर्क है कि किसी व्यापक रेवेन्यू मॉडल की सिफारिश को बाद में घोषित किसी खास MDR व्यवस्था के समर्थन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
यानी विवाद केवल इस बात पर नहीं है कि समिति ने MDR का जिक्र किया था या नहीं, बल्कि इस बात पर है कि समिति ने वास्तव में किस प्रस्ताव पर चर्चा की थी और रिपोर्ट में दर्ज सिफारिश का वर्तमान सरकारी व्यवस्था से कितना सीधा संबंध है।
12 अगस्त की बैठक और पांच कांग्रेस सांसद
सरकारी सूत्रों ने 12 अगस्त की बैठक को अपने दावे के समर्थन में महत्वपूर्ण बताया है। उनके अनुसार, समिति ने उस समय संबंधित रिपोर्ट को अपनाया था और पांच कांग्रेस सांसद बैठक में मौजूद थे। प्रकाशित कार्यवाही में उनके नाम से कोई औपचारिक असहमति दर्ज नहीं हुई।
इन सांसदों में पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी, गौरव गोगोई, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ शामिल हैं। सरकार इसी तथ्य का हवाला देते हुए कांग्रेस के मौजूदा रुख पर सवाल उठा रही है।
हालांकि, कांग्रेस सांसदों का कहना है कि किसी विशिष्ट प्रस्ताव पर औपचारिक असहमति दर्ज नहीं होने का अर्थ यह नहीं है कि बाद में घोषित MDR व्यवस्था को समिति के सभी सदस्यों ने मंजूरी दे दी थी। उनके अनुसार, जिस खास दर और शुल्क व्यवस्था की घोषणा बाद में हुई, वह समिति के सामने चर्चा के लिए नहीं आई थी।
UPI पर MDR व्यवस्था क्या है?
MDR यानी Merchant Discount Rate वह शुल्क है जो डिजिटल भुगतान से जुड़े लेनदेन में व्यापारी पक्ष से लिया जा सकता है। UPI के मामले में लंबे समय से जीरो-MDR व्यवस्था के तहत अधिकांश सामान्य UPI लेनदेन पर व्यापारी से MDR नहीं लिया जाता रहा है।
अब प्रस्तावित नई व्यवस्था में 2,000 रुपये से अधिक के पात्र कारोबारी UPI लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू करने की बात सामने आई है। यह शुल्क ग्राहक के बजाय व्यापारी से लिया जाना है। 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन पर इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये रखे जाने की जानकारी सामने आई है। व्यक्ति से व्यक्ति होने वाले UPI लेनदेन को इस व्यवस्था से अलग रखा गया है।
छोटे कारोबारियों के लिए भी अलग प्रावधान बताए गए हैं। UPI QR के जरिए महीने में 1 लाख रुपये तक प्राप्त करने वाले छोटे व्यापारियों को प्रस्तावित MDR से बाहर रखने की बात कही गई है। कुछ जरूरी सेवाओं के लिए अलग दर का प्रावधान भी बताया गया है।
सरकार MDR की जरूरत क्यों बता रही है?
सरकार और समिति से जुड़े दस्तावेजों में UPI इकोसिस्टम की वित्तीय स्थिरता को MDR से जोड़कर देखा गया है। समिति ने इस बात पर चिंता जताई थी कि मौजूदा व्यवस्था में भुगतान सेवा प्रदाताओं और डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम से जुड़े खर्चों के मुकाबले सरकारी प्रोत्साहन पर्याप्त नहीं हो सकता।
रिपोर्ट में साइबर सुरक्षा, फ्रॉड रोकथाम और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में लगातार निवेश की जरूरत का उल्लेख किया गया है। समिति ने एक ऐसे रेवेन्यू मॉडल की आवश्यकता पर जोर दिया था जिससे UPI के विस्तार और संचालन के लिए केवल सरकारी सहायता पर निर्भरता कम हो।
सरकार का कहना है कि प्रस्तावित MDR सीधे आम ग्राहकों से नहीं लिया जाएगा। इसके पीछे डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लंबे समय तक वित्तीय रूप से टिकाऊ बनाने का उद्देश्य बताया गया है।
कांग्रेस और सरकार के दावों में अंतर
इस पूरे विवाद में दोनों पक्षों की स्थिति अलग है। सरकार प्रकाशित समिति कार्यवाही और रिपोर्ट में दर्ज सिफारिशों का हवाला दे रही है। उसके अनुसार, समिति ने टियर-बेस्ड MDR या रेवेन्यू मॉडल को आगे बढ़ाने की जरूरत बताई और रिपोर्ट को अपनाते समय कोई औपचारिक विरोध दर्ज नहीं हुआ।
कांग्रेस सांसद दूसरी तरफ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि समिति के सामने मौजूदा सरकार द्वारा घोषित विशिष्ट MDR प्रस्ताव नहीं रखा गया था। उनका कहना है कि MDR के सिद्धांत और जरूरत पर सवाल जरूर उठाए गए थे।
इसलिए मौजूदा राजनीतिक विवाद को समिति की व्यापक सिफारिश बनाम सरकार की विशिष्ट MDR व्यवस्था के संदर्भ में समझा जा रहा है। प्रकाशित रिकॉर्ड में औपचारिक असहमति नहीं होने और सांसदों द्वारा बैठकों में उठाए गए सवालों के दावे—दोनों को अलग-अलग स्तर पर देखा जा रहा है।
आगे क्या?
UPI MDR को लेकर विवाद अब संसद, सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। एक ओर सरकार डिजिटल पेमेंट सिस्टम के लिए स्थायी रेवेन्यू मॉडल की जरूरत पर जोर दे रही है, जबकि कांग्रेस इस बात पर सवाल उठा रही है कि हाल में घोषित विशिष्ट MDR प्रस्ताव को संसदीय समिति की पिछली सिफारिश का समर्थन कैसे माना जा सकता है।
फिलहाल उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी से इतना स्पष्ट है कि समिति की रिपोर्ट में UPI के लिए टियर-बेस्ड रेवेन्यू मॉडल की जरूरत का उल्लेख हुआ था, जबकि कांग्रेस सांसदों का कहना है कि 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाली विशिष्ट MDR व्यवस्था—उसकी दर, सीमा और छूट समेत—समिति के सामने चर्चा के लिए नहीं रखी गई थी।
इसी अंतर ने UPI MDR को लेकर राजनीतिक विवाद को और बढ़ा दिया है। आने वाले समय में सरकार की ओर से जारी नियमों और संसद में होने वाली चर्चा से इस व्यवस्था को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
