करगिल के बाद सत्ता पलट—वाजपेयी की ‘बरकत’ और हरियाणा की सियासी साज़िश

“गुस्ताख़ी माफ़ हरियाणा : पवन कुमार बंसल”

हरियाणा की राजनीति के एक कड़वे अध्याय को याद करते हुए वरिष्ठ पत्रकार पवन कुमार बंसल ने अपने आगामी पुस्तक “Murky Politics of Haryana : Politics, Culture and Governance” से कुछ अंश साझा किए हैं। पूरे देश में आज पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सफल गठबंधन सरकार चलाने वाले नेता के रूप में याद किया जा रहा है, लेकिन हरियाणा की राजनीति से जुड़ा एक तथ्य ऐसा भी है, जो आज तक सवालों के घेरे में है।

पुस्तक के अनुसार, जब हरियाणा में बंसीलाल के नेतृत्व वाली हरियाणा विकास पार्टी (HVP) और भाजपा की गठबंधन सरकार थी, उसी दौरान भाजपा संगठन के तत्कालीन हरियाणा प्रभारी मनोहर लाल खट्टर, राव नरबीर सिंह और रामबिलास शर्मा की तिकड़ी ने असंतुष्ट विधायकों के साथ मिलकर सरकार गिराने की पटकथा लिखी। इस पूरे घटनाक्रम को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आशीर्वाद प्राप्त बताया गया है, जिसके परिणामस्वरूप ओमप्रकाश चौटाला के नेतृत्व में नई सरकार बनी।

लेखक के अनुसार, यह घटनाक्रम उस समय हुआ जब देश करगिल युद्ध के बाद के हालात से जूझ रहा था। जहां एक ओर देश के जवान सीमाओं पर बलिदान दे रहे थे, वहीं दूसरी ओर हरियाणा में सत्ता के लिए खुलेआम जोड़-तोड़ और हॉर्स ट्रेडिंग चल रही थी। यही कारण है कि इस राजनीतिक घटनाक्रम को “शर्मनाक” और “दुखद” बताया गया है।

पुस्तक में उल्लेख है कि 1996 के विधानसभा चुनाव में HVP और भाजपा ने पूर्व-चुनावी गठबंधन किया था, जिसके तहत बंसीलाल मुख्यमंत्री बने और भाजपा के आधा दर्जन मंत्री सरकार में शामिल हुए। लेकिन तीन साल बाद कृष्णा गहलोत, करण दलाल, राव नरबीर सिंह और बृज मोहन सिंगला ने बंसीलाल की कार्यशैली के खिलाफ बगावत कर दी। भाजपा विधायकों के समर्थन से सरकार अल्पमत में आ गई और ओमप्रकाश चौटाला के नेतृत्व में नई सरकार बना दी गई।

इस पूरे मामले में भाजपा हाईकमान भी बंटा हुआ बताया गया है। जहां अटल बिहारी वाजपेयी इस सत्ता परिवर्तन के पक्ष में थे, वहीं लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज इसका विरोध कर रहे थे। उल्लेखनीय है कि सुषमा स्वराज ने ही 1996 में HVP से गठबंधन सुनिश्चित कराया था और बाद में बंसीलाल ने उनके पति स्वराज कौशल को राज्यसभा सदस्य बनाकर इसका प्रतिदान दिया।

लेखक के अनुसार, रामबिलास शर्मा मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखते थे, जबकि मनोहर लाल खट्टर बंसीलाल द्वारा पर्याप्त महत्व न दिए जाने से नाराज़ थे। वहीं राव नरबीर सिंह अपने विभाग में बदलाव और एक अख़बारी रिपोर्ट के बाद असंतुष्ट थे। इन व्यक्तिगत कारणों ने मिलकर सरकार गिराने की भूमिका तैयार की।

इस राजनीतिक खेल पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए ‘द ट्रिब्यून’ अख़बार के पत्र संपादक कॉलम में अक्षय गुप्ता ने लिखा था—
“जब देश करगिल के बाद के दर्द से गुजर रहा था, उसी समय सत्ता के लिए घोड़े बदले जा रहे थे। क्या हमारे जवानों ने इसके लिए बलिदान दिया था? करगिल के खच्चर भी इन नए सियासी घोड़ों से बेहतर थे।”

हरियाणा की इस सियासी गाथा ने न सिर्फ उस दौर की राजनीति पर सवाल खड़े किए, बल्कि आज भी यह सोचने पर मजबूर करती है कि सत्ता की भूख किस हद तक राष्ट्रीय संवेदनाओं को पीछे छोड़ सकती है।

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