“विश्वगुरु बनने का भ्रम और हकीकत का आईना”

  • रिपोर्ट – मनोज कुमार यादव

आज़ादी के पचहत्तर वर्ष बीत चुके हैं। दुनिया बदल गई, व्यवस्थाएँ बदलीं, तकनीक ने इंसान को अंतरिक्ष तक पहुँचा दिया — पर हम अब भी वही खोखले नारों में उलझे हुए हैं। “विश्वगुरु भारत” का उद्घोष करते हुए हम भूल जाते हैं कि विश्वगुरु बनने के लिए केवल भाषण नहीं, बल्कि दिशा, दृष्टि और दृढ़ता चाहिए — जो आज की व्यवस्था में कहीं खो चुकी लगती है।

जब महिलाएँ आज भी सशक्तीकरण का इंतज़ार कर रही हों, तो यह दावा करना कि हम विश्वगुरु हैं, एक उपहास से अधिक कुछ नहीं। जिस समाज में नारी सुरक्षा और सम्मान पर बहसें होती हों, और न्याय वर्षों की प्रतीक्षा में हो — वहाँ “शक्ति का प्रतीक” कहकर केवल उत्सव मनाना आत्मप्रवंचना है।

आर्थिक मोर्चे पर भी स्थिति किसी सशक्त राष्ट्र जैसी नहीं। हम निर्यात से अधिक आयात करते हैं, आत्मनिर्भरता के नारों में आत्मघाती नीतियाँ छिपी हैं। विदेशी ब्रांडों पर निर्भर उपभोक्ता, विदेशी पूँजी पर टिका बाजार, और विदेशी तकनीक पर टिकी विकास की इमारत — यह सब किस विश्वगुरु की पहचान है?
युवाओं की दशा इस भ्रम का अगला अध्याय है। रोजगार योजनाएँ घोषणाओं की भीड़ में दम तोड़ चुकी हैं। डिग्रियों से लैस नौजवान ठोकरें खा रहे हैं, अवसरों की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं, और व्यवस्था मौन है। क्या यही वह भारत है जो दुनिया को दिशा दिखाएगा?

विश्वगुरु की संज्ञा तब शोभा देती है जब देश आत्मनिर्भर हो, जब उसकी व्यवस्था पारदर्शी हो, जब उसके नागरिक गर्व से कह सकें कि “हम भ्रष्टाचारमुक्त भारत में जी रहे हैं।” लेकिन यहाँ तो नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार का तंत्र ऐसे फैला है मानो यह किसी व्यवस्था का मूलाधार हो। नीतियाँ व्यक्ति-विशेष के स्वार्थ से संचालित होती हैं, और जनता उम्मीदों की चिता पर सपनों का दाह संस्कार करती है।
और ऊपर से हम विश्व बैंक के सबसे बड़े कर्जदार बनकर भी सीना चौड़ा किए घूमते हैं। क्या कर्ज़ में डूबा हुआ राष्ट्र दूसरों को ज्ञान दे सकता है? क्या परावलंबन को पराक्रम समझ लेना हमारी नई परिभाषा है?

सच यह है कि “विश्वगुरु” शब्द अब एक राजनीतिक जुमला बन चुका है — एक ऐसा नारा जो हकीकत से कोसों दूर है। जब तक नारी सुरक्षित नहीं, युवा आत्मनिर्भर नहीं, किसान खुशहाल नहीं, शासन पारदर्शी नहीं और समाज में ईमानदारी की बुनियाद मजबूत नहीं — तब तक विश्वगुरु बनने का दावा केवल आत्ममुग्धता का प्रतीक रहेगा।
भारत को विश्वगुरु नहीं, पहले “स्वगुरु” बनना होगा — अपने दोषों का बोध, अपने दायित्वों का निर्वहन और अपने चरित्र का पुनर्निर्माण करना होगा। तभी यह धरती फिर से जगत को दिशा दिखाने योग्य बन सकेगी।

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