दुनिया में इन दिनों समुद्री रास्तों की अहमियत को लेकर चर्चा तेज है, खासकर ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में तनाव के बाद। लेकिन इसके साथ ही एक और महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग चर्चा में है—मलक्का जलडमरूमध्य, जिसे चीन की सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी माना जाता है।
क्या है मलक्का जलडमरूमध्य?
भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पास मलेशिया, इंडोनेशिया और सिंगापुर के बीच स्थित मलक्का जलडमरूमध्य एक संकरा समुद्री मार्ग है, जो हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ता है। इसकी लंबाई करीब 900 किलोमीटर है, जबकि सबसे संकीर्ण स्थान पर चौड़ाई मात्र 2.8 किलोमीटर रह जाती है।
‘मलक्का डिलेमा’ और चीन की चिंता
चीन की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा इस जलमार्ग पर काफी हद तक निर्भर है। साल 2003 में तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ ने इसे “मलक्का डिलेमा” नाम दिया था। चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और लगभग 80% तेल-गैस इसी रास्ते से होकर चीन पहुंचता है।
ऐसे में यदि इस मार्ग में कोई बाधा आती है, तो चीन की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है।
भारत के लिए रणनीतिक बढ़त
मलक्का जलडमरूमध्य के आसपास भारतीय नौसेना की मजबूत मौजूदगी भारत को रणनीतिक बढ़त देती है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की भौगोलिक स्थिति इस क्षेत्र में भारत को विशेष ताकत प्रदान करती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़े संघर्ष की स्थिति में यह मार्ग चीन के लिए कमजोर कड़ी साबित हो सकता है।
दुनिया के लिए क्यों अहम है यह रास्ता?
मलक्का जलडमरूमध्य केवल चीन ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
दुनिया के करीब 25-40% समुद्री व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है
हर साल 60,000 से ज्यादा जहाज यहां से निकलते हैं
यह यूरोप, अफ्रीका और एशिया के बीच सबसे छोटा समुद्री मार्ग है
यह मार्ग भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को जोड़ने में अहम भूमिका निभाता है।
विकल्प खोजने में जुटा चीन
चीन अपनी इस निर्भरता को कम करने के लिए वैकल्पिक रास्तों की तलाश में है। पाकिस्तान में ग्वादर पोर्ट का विकास और वहां से सड़क मार्ग के जरिए सामान पहुंचाने की योजना भी इसी रणनीति का हिस्सा है। हालांकि, फिलहाल यह मलक्का जलडमरूमध्य का पूर्ण विकल्प नहीं बन पाया है।
मलक्का जलडमरूमध्य न केवल वैश्विक व्यापार की धुरी है, बल्कि एशिया की भू-राजनीति का केंद्र भी बन चुका है। इस पर नियंत्रण या बाधा का असर केवल किसी एक देश पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
