मशहूर शायर बशीर बद्र का निधन, लेकिन हमेशा जिंदा रहेंगी उनकी गजलें और शेर

  • रिपोर्ट: प्राची सिंह

मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनकी शायरी हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेगी। उनके निधन से साहित्य और शायरी जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। अपनी गजल और शेरों के जरिए उन्होंने लाखों लोगों के दिलों में खास जगह बनाई। उनकी शायरी की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे गहरी और मुश्किल बातों को भी बेहद आसान शब्दों में बयां कर देते थे। मोहब्बत, दर्द, उम्मीद और जिंदगी के अनुभव उनकी रचनाओं में साफ झलकते थे। यही वजह थी कि हर उम्र के लोग उनकी शायरी से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करते थे।

अयोध्या से शुरू हुआ शायरी का सफर
बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुआ था। उनका असली नाम सय्यद मोहम्मद बशीर था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उर्दू के शिक्षक के रूप में काम किया। यहीं से उनकी शायरी को पहचान मिलनी शुरू हुई। बाद में वे मेरठ कॉलेज में उर्दू विभाग के अध्यक्ष भी बने। उनकी गजलें धीरे-धीरे मुशायरों और किताबों के जरिए लोगों तक पहुंचीं। आसान भाषा और दिल को छू लेने वाले अंदाज ने उन्हें आम लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया।

‘बद्र’ शब्द का क्या है मतलब
कई लोग यह जानना चाहते हैं कि उन्होंने अपने नाम के साथ ‘बद्र’ क्यों लगाया। उर्दू और फारसी भाषा में ‘बद्र’ का अर्थ पूरा चांद होता है। इसे रोशनी, खूबसूरती और चमक का प्रतीक माना जाता है। बशीर बद्र की शायरी भी कुछ ऐसी ही थी, जो सीधे दिल में उतर जाती थी। उनकी गजलें पढ़कर लोगों को अपनापन महसूस होता था। यही कारण था कि उन्होंने ‘बद्र’ को अपना तखल्लुस यानी उपनाम बनाया।

मेरठ दंगों ने बदल दी जिंदगी
बशीर बद्र की जिंदगी में एक ऐसा दौर भी आया जिसने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया। साल 1987 के मेरठ दंगों में उनका घर जला दिया गया। उस घर में उनकी जिंदगी भर की कमाई, किताबें, डायरी और गजलें रखी थीं। इस हादसे के बाद वे लंबे समय तक सदमे में रहे और उन्होंने लिखना भी लगभग छोड़ दिया। बाद में वे भोपाल जाकर बस गए। हालांकि इतने बड़े दुख के बाद भी उनकी शायरी लोगों के दिलों तक पहुंचती रही।

बशीर बद्र सिर्फ एक शायर नहीं थे, बल्कि लोगों के जज्बात की आवाज थे। उनका मशहूर शेर “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में” आज भी लोगों की जुबान पर है। वे लंबे समय से डिमेंशिया बीमारी से जूझ रहे थे और आखिरकार 91 साल की उम्र में भोपाल में उनका निधन हो गया। भले ही आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी गजलें और शेर आने वाले समय में भी मोहब्बत और एहसास की पहचान बने रहेंगे।

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